हमारे पुरातन ऋषि परम्परा से ही यज्ञ हवन यंत्र मन्त्र आदि गूढ़ विद्याएँ विद्यमान रही हैं जो कि हमे विरासत में मिली है जिसका उपयोग करके जीवन को सुखमय बनाया जा सकता है ।
आप जब किसी परेशानी का हल ढूंढते हैं तो ज्योतिष के पास जाते हैं जब आप उपाय करके थक जाते हैं तो ईश्वर से भी भरोसा उठ जाता है क्योंकि उपाय कितना करेंगे और ग्रहों का खेल पल भर के लिए तो नही होता । वह नियत समय तक बना रहता है ।
ऐसे में यंत्रो का महत्व क्यों है?
असल मे पूजा पाठ और कीमती रत्नों को पहनकर भी जब आप परेशान रहते हैं तो यंत्र आपकी मदद करते हैं
इसकी खासियत है कि यह रत्नों की तरह उल्टा असर नही करता क्योकि आप बिना ज्ञात किये गलत रत्न अंगूठी ,लॉकेट पहनते हैं तो ग्रह की चाल उल्टा करके अज्ञानता वश अपना अमंगल कर लेते हैं ।
पर यंत्र बिल्कुल आपको प्रभावित करेगा ।
इसका कोई गलत प्रभाव नही होता है ।
जानते हैं कि किस तरह निर्मित होता है ।
कागज,भोजपत्र और तांबे पर बनते हैं यदि आप मार्किट से बना यंत्र खरीदते हैं तो विशेष मुहूर्त में निर्मित किआ गया हो इसका कोई आधार नहीं है जब भी खरीदें किसी विश्वसनीय ज्योतिष की मदद से ही यंत्र खरीदें।
जब आपके ग्रह असरदार नही होते या शुभ परिणाम नही दे रहे हों तो हर ग्रह का उसका अपना यंत्र होता है । आप यंत्र द्वारा उसकी ऊर्जा को सीधा प्राप्त कर सकते हैं जैसे एक साधक साधना में ईश्वर के समीप जुड़ जाता है ठीक यंत्र भी आपके लिए कवच का काम करता है ।
जब आप अपने शांत करने या शक्ति या कार्यसिद्धि समृद्धि के लिए सम्बंधित ग्रह का यंत्र बनवाते है या खरिदते हैं तो उस ग्रह विशेष का मंत्र उच्चारण से पंचामृत, गंगाजल से प्राणप्रतिष्ठा किया जाता है ।
यदि आप खुद यह न कर सकें तो किसी अच्छे पण्डित की सहायता से प्राणप्रतिष्ठा कराकर यंत्र को पूजा स्थल या द्वार , ऑफिक आदि जगहों पर लगा सकते हैं ।
डेली पूजा करने से डायरेक्ट कॉस्मिक ऊर्जा उस ग्रह से सम्बंधित आपके कष्ट को हर लेती है।
हालांकि इन यंत्रो का सही प्रयोग करें किसी को तक्लीफ ना दें और अच्छे नियत से आप कुछ करते हैं तो यंत्रो और मन्त्रो की शक्ति आपके जीवन में आने वाली हर बाधा से कवच प्रदान करेगी ।
खुशियों से भरा हो लाखों पल ,कहीं नैन नमी से युक्त रहे झरझर बरखा जो बून्द पड़े , फिर भी अंगना हो अनल तले नभचर ख़ग दाना- दाना को ,अन्न नीर बिना जैसे तरसें विचरे नभः में पंखे लहरा , उन्मुक्त गगन से दूर चले जो क्षितीज दिखे पंखों के परे ,भानू किरणों से तपता रहा अंकित जो करूँ दुःख का बादल ,चहुँ ओर घिरे पर भीग रहे ना उड़ पाया न ठहर सका, हर तरफ ही नीड़ तलाश रहा बेबसी के काले बादलों ने ,सपनों की उड़ानें रद्द कर दी चंचल ऋतुओं का क्या कहने,बेवक्त मिजाज बदल बैठे बेमानी लगे सावन भी उसे ,वो मयूर नहीं जो थिरक सके पंखें भीगी नम नैन हुए, किस ओर दिशा में नीड़ बसे। गायत्री शर्मा
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें