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बागी औरत

 औरत घर चलाये और पुरुष ऑफिस जाए
औरत खाना बनाये और पुरूष कमाकर लाये
पति  अपनी बदहाल हालत कैसे खुलकर कह दे 
कि ऑफिस में बॉस की फटकार खिन्न कर देती है उसे
कहीं तो गुस्सा फूटेगा चलो घर चलकर खबर लेते हैं
बिना कुसूर के औरत पिटती जा रही थी 
पति बॉस का गुस्सा उतार रहा था 
एक बेजुबान जानवर समझकर उसे धोता गया
अपनी ही गृहलक्ष्मी को जिसका अनादर कर धन की लक्ष्मी कमाने ऑफिस जाता है 
औरत सहती गई हर जुल्म को कि अर्थी उतनी है ससुराल से
जो बागी हो गई अपने अधिकारों के लिए सम्मान के लिए वह महिला पापी हो गई 
और पुरुष लांछन से बच निकला कुछ कीचड़ उसके दामन में छींटकर
कैसे हार मान लेती घुटने टेक देती सहन कर लेती पिटती रहती वह कैसे मान लेती कि स्त्री निर्जीव वस्तु नहीं है जिसे जैसे चाहो वैसे रौंदों
स्त्री प्रकृति है जो सिर्फ प्रेम लुटाती है 
 प्रकृति का मनमोहक दृश्य मन को लुभाता है तो क्या उसका विकराल रूप तुम सहन कर पाते हो 
ज्वारभाटा , ये आपदाएं जो प्रकृति का दोहन करते  जाओ और वो विकराल ना हो कैसे सम्भव है
तो क्या वह सजीव स्त्री जिसे रौंदकर उसे निष्प्राण होने का आभास कराते हो 
जब देखते हो उसका उग्रता, बदले की भावना, सम्मान के लिए टकराव, आर पार की लड़ाई, तो विचलित हो जाते हो 
क्योंकि तुम पुरुष हो उग्रता सिर्फ तुम्हारा सौंदर्य है इस भ्रम को वह तोड़े तो हाँ बहुत से उपमा दे देते हो औरत को !
कलंकिनी, चरित्रहीन, लज्जाहीन स्त्री , बागी औरत ,और न जाने कितनी ही कुंठित मानसिकता से भरे उपमाएँ 
जो पुरुष उसे देता है क्या  सोचता है वह   हर सीमा लांघ जाएगा और स्त्री बागी न बने
आखिर वह तुम्हारी ही अर्धांगिनी है तुम्हारा हिस्सा है वजूद है उसी से तुम पूरे हो 
अपने ही अंग को कष्ट देकर क्या तुम्हें पीड़ा तनिक नहीं होती 
अगर हाँ तुम पत्थर दिल हो तो धिक्कार करो खुद पर कि तुम जीवित हो  ,तुम मानव नहीं कलंक हो , जीवित तो हो किन्तु सिर्फ एक पाषाण बनकर !!!

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