एकाएक चिंतन का रूख तुम्हारी ओर मुङा आँखों में नींद भरी जहन में कुछ बातें सिमटी हुई सी स्वप्नलोक का विचरण करती हुई सी हमेशा तुम्हारे साथ की चाह लिए मन में वो घङी नजदीक था मैं मग्न रही संगीतमय ध्वनियों के बीच तुम्हे याद करके जो नजारा दूर से देखा करती थी वह मैने बहुत करीब से देखा तुम्हारी एक आवाज ने जैसे मुझे मेरे काम में निपुणता प्रदान किया हो जो मेरे निश्छल स्वार्थरहित कर्म की ओर झुकाव था कि आज तुमसे फुर्सत में गुफ्तगू हुई सभी की नजरें मेरी तरफ थी परंतु मेरी नजर सिर्फ तुम्हे निहारती रही
कि ये पल बीत ना जाए और तुम मेरी आंखो से ओझल ना हो जाओ
एक आत्मिय चुंबकीय संचार रग रग में समाहित हुआ ऐसा आभास जैसे कि चातक को स्वाति नक्षत्र का जल बिंदु मिल गया हो
और उसे पीकर अपना जीवन प्राण बचा लेता है
एक सलोना स्वप्न जो हमेशा की तरह नवीन अनुभवों को जहन में समेटता हुआ सा प्रतीत हुआ हर बार की तरह एक बार फिर यह पल जिसमें तुम मेरे साथ नजर आए
मैं स्वप्नों की दिग्दर्शिका तक ही सीमित कैसे रह सकती थी यह जो अपार आत्मिक साम्राज्य मेरे पास है इसके आगे सभी स्थान ,पदार्थ ये जहान शायद कुछ भी नहीं है
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