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अंकुर जैसे नवजीवन लेकर धरती पर आते हैं
संत समागम हरि कथा के बीज धरा पर बोते हैं
सूखा अकाल तबाही से जब त्राहिमाम मच जाता है
जीवन के आसार कहीं भी नजर नहीं आता है
करूणानिधान जीवों पर तब प्रेम की वर्षा करते हैं
फसलें लहराने लगती और धरती हरित हो जाती है
अन्न फलों मेवों से जीव पेट क्षुधा मिटने लगता है
उसकी करूणा प्रेम को मानव शनै शनै भूले जाता है
मानवता के विनाश की गाथा मानव स्वयं लिखने लगता है
लोक परलोक सुधारने का प्रयास विफल होने लगता है
चौरासी के दारूण फंदे में जीव उलझने लगता है
प्रभु कृपा से संत जीवों के दारूण दुख हरने आते हैं
ज्योति पूंज का ध्यान कराकर हरि से भेंट कराते हैं
अंतर्मन छल कपट के परदे को प्राणी धूमिल कर देता है
निर्मल मन के दर्पण में वह हरि से नेह लगाता है
सत्संग है अति दुर्लभ जिसको संत कृपा से मिलता है
ना जाने किस शब्द चोट से आत्मा जागृत हो जाए
फिर फिर गोता भवसागर और पुनर्जन्म से बच जाए
बारंबार जन्म रूपी अंकुर बनने से वह बच जाए
बीज ही रहकर ज्ञान अग्नि में भुन जीवन मुक्त हो जाए
सब तीर्थों का तीरथ सत्संग जिसको तीरथराज कहा है
राम को हृदय में रखकर शिव ने सती को सत्संग सुनाया है
सत्संग की महिमा बेअंत है वेद पुराणों की वाणी है
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