दिव्य- पथ
एक गहरी खाई जो मेरे अनुमान से परे था हालांकि मेरे पाव फिसलने से बच गए , एवम् भय की कोई ऐसी अवस्था उत्पन्न नही हुई लेकिन उस गहरी खाई में से निकलना संभव भी नहीं था,एक बार जो कदम लड़खड़ा गए फिर वो उठ पाये बहुत कम मुमकिन होता है। साहस चाहिए आत्मविश्वास चाहिए सम्भलने की आत्मिक क्षमता चाहिए । लेकिन मुझमे वो क्षमता कहाँ से उत्पन्न हुई मैं आश्चर्य में पड़ गई कुछ समझ नही सकी ।
मेरी नजरें किसी तलाश में थी और मैं सब कुछ भूलकर उस दिशा की ओर बढ़ी मन बहुत विभोर था मानो जैसे सारी कायनात की खुशियाँ मुझे मिलने वाली है ,मात्र एक पल में । क्या सचमुच मैं उस स्थिति को पा चुकी थी? जिसके लिए मैंने सारी बाधाएँ पार की, परंतु हाँ यह सच था मैंने हर्षित ह्रदय में संकल्प लिए हुए अपने क़दमों को आगे बढ़ाया और अलौकिकता में समां गई यहां मैं कुछ और नहीं सोच सकती थी। कुछ देख नहीं सकती थी ।कुछ समझ नही सकती थी । जिस आभास को मैंने पाया वह अद्भुत था जिस प्रभाव में मैं बंध गई। वो डोर बंधनरहित था उन्मुक्त शिखर पर पहुचकर मैं सब कुछ भूल चुकी थी ,माना कि जिन राहों से मुझे गुजरना पड़ा उन राहों पर कदम लड़खड़ाते गए । एक आहट तो जरुर मिली ऐसा लगा मानो उस पल में कोई साथ चल रहा हो मेरे । क्या ये कल्पना था या हकीकत ।
"एक दिव्य पग" उस "दिव्य पथ" पर मेरे संग -संग रहा।
मैं नतमस्तक हो गई अपने आप को उस दिव्य समां में पाकर सचमुच मैं धन्य हो गई ।
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