मानव स्वभाव से ही चंचल आतुर लालची क्रोधी स्वार्थी होता है दूसरा पहलू इसके ठीक विपरीत है हम अपने अच्छे व्यवहार से ही अच्छे समाज को गढते हैं जिसमें सभी नैतिक जीवन मूल्यों का सम्मिश्रण होता है
आखिर संवेदना का होना ही तो जीवन का होना है
जिस समाज से हम बहुत कुछ प्राप्त करते हैं उस समाज को समर्पित होना उसके बेहतरी के लिए प्रयासरत रहना।
केवल अपना हित सोचना और करना यह प्रवृति मानव को स्वार्थी बनाता है मूल्यों का ह्वास होने से सामाजिक संरचना पर असर पङता है
परस्पर प्रेम की कङी में हमें समाज को जोङना है भ्रातृत्व प्रेम को बढाना है क्योंकि हम मानव हैं और धरती के सबसे बुद्धीजीवी प्राणी वर्ग की श्रेणी में प्रथम हैं तो इस शरीर के सूक्ष्म संरचना में नैतिक मूल्य जरूर समाहित होंगे ।
अन्यथा जीवन तो नीरस बना रहेगा।
जिस देह में प्राण ना हो वह निष्प्राण शरीर राख का ही ढेर होता है ठीक वैसा ही जैसे चैतन्य में संवेदनहीनता का बने रहना या संवेदना का क्षीण होना है ।
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