युद्ध एकल नहीं हर ओर गूंजे स्वर विभत्सनाएँ
सैनिकों के गाँव परिवार तक आती हैं सूचनाएँ
किसी के आँख का तारा किसी का सुहाग है प्यारा
न जाने कब कहाँ किस ओर से खबरें डराती हैं
युद्ध केवल दे जाता है ना मिटने की पीर भारी
देह से रूह तक कंपन करे कैसी प्रलय आयी
कहीं चूल्हे बूझे तो किसी बहन का सुहाग उजडे है
किसी के बुढ़ापे की लाठी किसी के आंख का तारा
कफ़न बांधे निकलकर के तिरंगा लिपटा आता है
युद्ध हरगिज ना होने पाए बेशक पक्ष अपना दो
उदारवादी सिद्धान्तों से ही बेशक युद्ध टालना है ।।
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