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पितृसत्ता के दौर में रिसाइकल हो रही बेटियाँ

 




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रिसाइकल हो रही बेटियाँ आखिर सच ही तो है जिन वस्तुओं का हम इस्तेमाल कर चुके हैं उनका दुबारा से इस्तेमाल करने के लिए रीसायकल करते हैं प्लास्टिक हो मेटल हो या कागज ।हम उन सभी चीजों को दुबारा इस्तेमाल करते हैं तकनिकी द्वारा हम बिलकुल नवनिर्माण से चीजें आसान कर पाने में धुरंधर हो गए हैं ।मानव समाज में स्त्री हो या पुरुष दोनों के साझा सहयोग से ही  विकास होता है बेशक पुरुष समाज नारी के योगदान को झुठला दे,या अपनी शाख़ पर प्रहार होने के डर से  मानव के रूप में एक स्त्री को लज्जित करे और जब बात पितृसत्ता सोच की हो तब मसला वाकई और गंभीर हो जाता है तो क्या हम ये गांठ बांधे रह सकते हैं कि महिलाएं बेटियाँ भी कोई वस्तु हैं और उनको उसी अप्रायोगिक वस्तु की तरह उन्हें केवल शरीर(निर्जीव) मानकर ,उनकी भावनाओं को कुचलकर ,उनकी उडान के पर कुतरकर उनको मानसिक रूप से पंगु बनाकर उनके निर्णयों को शून्य करके पुरुष सत्ता अपना वजूद खड़ा रखने में सक्षम होगी? तो ये बिलकुल गलत है साहब! किसी भी लक्ष्य को पाने में घर की महिलाओं बेटियों और परिवार का अहम् रोल होता है ऐसा कदापि नहीं होना चाहिए पुरुष स्वनिर्णय को ही सर्वोच्च निर्णय बताकर किसी अन्य सोच को बदल सके। और देखा जाये तो नारी कोई वस्तु नहीं उसकी अपनी स्वतंत्र सोच है स्वनिर्णय की अद्भुत क्षमता पुरुषों की तुलना कहीं ज्यादा और बेहतर है भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से लेकर फ़्रांसिसी क्रांति और नागरिक आंदोलन तक देश विदेश में महिलाओं ने अपना लोहा मनवाया है 1857 की क्रांति के बाद महात्मा गाँधी ने कहा था कि" हमारी माँओं-बहनों के सहयोग के बगैर यह संघर्ष संभव ही नहीं था।" जिन महिलाओं ने आजादी की लड़ाई को अपने साहस से धार दी, कस्तूरबा गांधी, विजयलक्ष्मी पंडित, अरुणा आसफ अली, सरोजिनी नायडू, सिस्टर निवेदिता, अन्य वो तमाम महिलाएं जो भारत भाग्य निर्माण में सहायक बनीं ।इसके बावजूद लिंग विभाजन और लैंगिक विभेद की जड़ें प्रबल हैं देश के आंतरिक हिस्सों में परिवार और समाज के बीच माँ, बहन, बेटी, बहू इनका वजूद चारदीवारी को तोड़ने को संघर्षरत है और पुरुष प्रधान उसे रौंदने को कदम कदम पर आतुर खड़ा है

चूँकि यह भी सत्य है कि रीसायकल केवल वस्तुओं का होता है। उपभोग ,केवल वस्तु का होता है हमें यह मालूम होना चाहिए कि महिलाएं कोई वस्तु नहीं ।जिवंत मानव जाति का एक हिस्सा है जिस प्रकार एक पुरुष है  इस पृथ्वी पर दोनों ही ईश्वर की सजीव और सुंदर रचना हैं बाइबल में समानता की बात है, हिन्दू धर्म ग्रंथ भी नारी के 9 रूपों की उपासना पर बल देता है , सिवाय मनुस्मृति जो सदैव नारी विरुद्ध रही है या हम यूँ कह सकते है कि यहां भी कुछ मूढ़ दम्भी और मक्कार पंडितों ने पुरुष सत्ता और पांडित्य की उत्कृष्टता दर्शाने हेतु धर्म के भय का कोड़ा मारकर फेरबदल करके समाज की बोलती बंद कर दी है परंतु सत्य तो अटल है  नारी की प्राथमिता वैदिक काल से ही है उमा-शंकर, राधा-कृष्ण, सीता-राम, लक्ष्मी-पति, हिन्दू धर्म के महँ अवतारों ने भी स्त्री को प्रथम और श्रेष्ठ दिखाया । मानव समाज को श् आदर्श सिखाया तो हमें उस रचयिता की रचना में  सहयोग करना चाहिए कि प्रत्येक मानव जो स्त्री पुरुष दोनों ही मानव श्रेणी में आते हैं उनके हितों की रक्षा हो ,सामान अधिकार और समान अवसर मिले पितृसत्ता और कट्टर सोच हमसे उत्त्पन्न हुआ है और उसे हम ही मिलकर खत्म कर सकते हैं 

भारतीय संविधान भी अधिकारों की बात करता है और क़ानूनी तौर पर उन अधिकाडों की सुरक्षा की गारंटी भी प्रदान करता है  हमारे जो मूल अधिकार हैं वे सभी नागरिकों के लिए है हमें यह यद् रखना चाहिए सभी नागरिक अर्थात वे सभी स्त्री- पुरुष  , लड़का-लड़की जो इस देश के नागरिक हैं उन्हें उनके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। बावजूद इसके नियमों और कायदे कानूनों को हम ताक पर रख देते हैं 

यदि कोई महिला अपना स्वतंत्र निर्णय लेने के पक्ष में बात करे या अपने अधिकारों की बात करे अथवा अपने बच्चों के भविष्य के फैसले में अपनी राय कायम करे तो यहां उसे मूक बना दिया जाता है यह हवाला देकर कि घर के मर्द अभी जिन्दा हैं । यानि ।वह सब कुछ कर सकते है बेहतर निर्णय ले सकते हैं  क्योंकि वह एक पुरुष  है और परिवार का पोषण करने की वजह से उनका हर निर्णय ऊपर है इस स्थिति में शराबी और नशे से चूर कोई मुखिया कैसे परिवार के भविष्य को सुरक्षित रख सकता है और स्वतंत्रता की परिभाषा भी क्या इन्ही पर फिट बैठती है ? असल में सोचने वाली बात है कि क्या महिलाएं गुलाम तो नहीं हो रही हैं। हाँ ये बात अलग है कि पहले और अब के समय को देखा जाये तो महिला पुरुष प्रतिद्वन्दी हैं लेकिन फिर भी इस मुकाम के लिए उन्हें कितना बलिदान करना पड़ा होगा यह बात बहुत मायने रखता है। हम केरल को देखें तो वहां पर मातृसत्ता है बाकी अन्य जगह ऐसा नही हैं हाँ ! कुछ उच्च स्तर और सभ्य परिवारों में महिलाएं स्वतंत्र निर्णय ले सकती हैं मुखरित हो रही महिलाएं आज चुनौती बनी हुए हैं उन लोगो के लिए जो उन्हें घर से बाहर देखना बिलकुल पसंद नहीं करते ।

कहते है कि बेटी का जीवन पिता ,पति,पुत्र के संरक्षण में ही सफल होता है । मनुस्मृति की ये निराधार बातें आज के परिप्रेक्ष्य में फिट नहीं बैठती  । भावनात्मक दृष्टि से देखें तो आखिर एक बात हर लड़की के जहन में होती है जब इस तरह की कट्टर पितृसोच को थोंपा जाता है तो प्रश्न यह उठता है कि क्या एक लड़की का अपना स्वतंत्र कोई वजूद नहीं ??? तब उस जीवन का क्या मोल जो चेतन है जिसकी अनेकों सपने इच्छाएं, और बेहतरीन तार्किक  निर्णय निर्माण की क्षमताएं हैं । उस शरीर (महिला)का क्या ? जो प्राणों के साथ अचेत रूप से जीने को विवश हैं । नहीं ! ये तो अन्याय है वो विवश नहीं हैं उन्हें विवश किया जाता है । यूँ कहे तो सभ्यता, मर्यादा ,शालीनता का खोखला तर्क देकर, तो चलिए कुछ देर के लिए ही सही एक पुरुष को ये आज्ञा दिया जाये की वह अपनी मूंछो को काट ले बालों के गुंथी बना ले अपने परिधान को बदल ले और अपनी आवाज को धीमी कर ले बिलकुल उस औरत की तरह जिसे उसके विपरीत नियमों में बांधकर रखा जाता है तो  यह संभव है कि आपको घुटन और बेचैनी होगी आप मजबूर हो जायेंगे खुद के बारे में सोचने पर कि ऐसा क्यों हो रहा है । जब आप अपने पुरुषत्व व्यव्हार को नहीं बदलना चाहते तो आप यह कैसे उम्मीद करते हैं कि आपका निर्णय सर्वदा हित कारक होगा।

ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार सरकार अपने नागरिकों के लिए नियम और कानून बनाती है उन्हें सुविधाएँ मुहैया कराती है ,केंद्र और राज्य स्तर पर पॉलिसी बनाकर उन्हें क्रियान्वित करती है फिर भी कुछ कुछ कमियां रह जाती है

तो आप कैसे किसी बेटी के महिला के भावनाओं की गुत्थी को अनसुलझा बनाये रखेंगे।

एक पुरुष के रूप में आप खुद के साथ ज्यादती नहीं होने देना चाहते ।तो क्या आप ये ज्यादती महिलाओं के साथ करना चाहेंगे? सवाल बहुत छोटा सा है किंतु निर्णायक भूमिका किसकी होनी चाहिए यह बहुत मायने रखता है कि आप अपने अधिकारों के साथ जियें अपने भावनाओं की कद्र करें किसी भी बहरी दबावपूर्ण निर्णय खुद पर सरलता से लागू होने से पहले अपनी अन्तरात्मा की आवाज को सुनें । 

मुझे यहां पर आई. ए. एस.2014 ईरा सिंघल की बात या रही है जो यह मानती हैं कि  ----आप अपने अपने भीतर छुपे क्षमता को स्वयं पहचानें कोई और आपको नहीं जानता ,किसी और को कोई फर्क नही पड़ता किन्तु आप खुद के बारे में बेहतर जानते हैं ।

इस तरह कई कामयाब औरतों के उदाहरण हैं जिनको हम चुनौतियों से लड़कर आगे बढ़ते देख रहे  है । 

आप भी एक औरत हैं आपके स्वतंत्र वजूद है अपने वजूद के साथ न्याय करें , खुद को जियें । 

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