वाल्मीकि जी को एक बार ब्रम्हा की भविष्यवाणी सुनाई दी कि भगवती लक्ष्मी का मानवीय प्रतिरूप सीता का वन गमन होगा और ब्रम्हा जी के कथन के अनुसार महर्षि को ही सीता की देखरेख करनी है एक निश्चित समय तक जब तक कि यह कलंक ना मिट जाए।
महर्षि की तपस्या सफल हुई वह साक्षात भगवती को पुत्री के रूप में पाकर धन्य हो गए। शायद भी तय था कि महर्षि की कोई पुत्री नही थी तो यह इच्छा भी साक्षात भगवती को ही पूरी करनी थी । मां हमेशा अपने भक्तो का ख्याल रखती है । इसलिए तो वह चाहती तो सीता के रूप मे अपने मायके जाकर पुत्रो को जन्म दे सकती थी किन्तु नियति का हर कदम भक्तों के लिए सुखदाई रहा।
वहीं दूसरी तरफ लक्ष्मण आहत थे कि राम ने अन्याय किआ , सीता भाभी के त्याग को नही देखा उन्हें अकेला छोड़ दिया वन में। तब वो रुष्ट होकर महल छोड़कर चले गए । लक्ष्मण नहीं जानते थे कि इन घटनाओं के पीछे क्या रहस्य छिपा था। ।
दरसल सतयुग में श्री हरि को श्राप मिला था एक बार 10 देव दानव संग्राम हुआ जिसमें देवता जीत गए और असुर हार गए ।
कुछ राक्षस बच गए वे भाग गए और भृगु ऋषि के आश्रम में छिपे एक शरणागत होकर । तब ऋषि की पत्नी न उनकी रक्षा की ।
तभी कुछ देवता इंद्र के साथ पधारे कि हमे राक्षसों को सौंप दीजिये। ऋषि की पत्नी ने धर्म के खिलाफ कहकर उन्हें भेज दिया। फिर देवताओं के गुहार लगाने पर श्री हरि साक्षात प्रगट हुए और भृगु पत्नी से कहा आप राक्षसों को हमे सौंप दीजिये।
तब ऋषि पत्नी ने धर्म विरुद्ध कहकर प्रभु के हाथों अपनी मृत्यु का सौभाग्य प्राप्त किया ।
और प्रभु ने राक्षसों का भी वध करके एक बड़े समुदाय को आतंक से मुक्ति दिलाई।
अब भृगु आश्रम पधारे तो उन्होंने विष्णु को श्राप दिया कि मनुष्य रूप में जीवन का एक भाग तुम भी पत्नी वियोग में बिताओगे ।
तब श्री हरि ने भृगु ऋषि को यह तर्क दिया कि 2 सही रास्तों में किसी एक का चयन करना पड़े तो वही राह चुनो जिससे ज्यादा से ज्यादा लोगों का कल्याण हो। मैं श्राप स्वीकारता हूँ किन्तु दैत्यों द्वारा एक बड़े समुदाय का नाश नही स्वीकार सकता था
भृगु तुम्हारे श्राप के अनुसार मैं त्रेता में मनुष्य रूप लेकर आऊंगा और यह श्राप जरूर पूरा करूँगा ।
और भक्त के श्राप को श्री हरि ने सहर्ष स्वीकार किया।
इसलिए कहते हैं प्रबल प्रेम के पक्ष में रहकर प्रभु को नियम बदलते देखा
अपना मान भले टल जाए भक्त का मान न टलते देखा ।।
यही है प्रभु की महानता ।
कर्म के बंधन से कोई आजाद नहीं है यही मार्ग दिखाया प्रभु ने खुद पर श्राप स्वीकार कर ।
जब यह रहस्य लक्ष्मण को पता चला तो उन्होंने खुद को आत्महत्या से रोक लिया । और पुनः अयोध्या लौट आये।
दूसरी तरफ सीता वाल्मीकी आश्रम के सारे कठिन कार्य करती थी उन्हें भय था कि उनके रघुकुल की कीर्ति धूमिल ना हो जाये । और इस प्रकार सीता ने चारा लाना , लकड़ी काटना, पानी भरना आदि सब कार्य किये उस कुटिया में और आने वाले बच्चों को लव कुश को भी स्वाभिमानी बनाया की आने वाले समय मे कोई भी उन्हें ताना ना मार सके यदि ऐसा होता तो सूर्यवंश को दाग लगता।
यहाँ सीता ने स्त्री के मनोबल को उसके स्वाभिमानी होने और बच्चों में आदर्श गुण भरने जैसे महान आदर्श रखे हैं कि जब भी स्त्री के सामने ऐसी परिस्थिति आये तो वह अभिमान के साथ अपने स्वाभिमान की रक्षा करे और आदर्श प्रस्तुत करें । अपने कुल की मान मर्यादा के लिए जो भी त्याग देने पड़े वह पीछे ना हटे।
सीता माता की यह मानव लीला मनुष्य जाति में स्त्रियों के लिए आदर्श है। देवी स्वरूपा माता लक्ष्मी दुनिया को समृद्धि देती हैं यह दारुन दुःख सहने की लीला सिर्फ मानव जाति को उचित मार्ग दिखाने के लिए थी क्योंकि कई बार श्राप वरदान में बदल जाता है । ना भृगु को नियति ने जरिया बनाया होता न प्रभु ने उनका श्राप लेकर रामावतार की लीला रची होती । तो क्या हम वर्तमान कलयुग में अयोध्या राम जन्म भूमि पर मंदिर निर्माण का अद्भुत सुख भोग सकते थे। कदापि नहीं ।
इसलिए प्रभु की लीला गूढ़ आध्यात्मिक रहस्य से होकर परे है इसे समझने के लिए मानव बुद्धि से परे जाना होगा।।
जिस प्रकार आज विज्ञान की लैबोरेटरी है वैज्ञानिक खोज के लिए तो उस समय मे ऋषियों की दिव्यदृष्टि आंतरिक हृदय ही शोध की लेबोरेटरी थी। आध्यात्मिक खोज के लिए ।
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