दिव्यदृष्टि क्या है ??
अष्टांग योग द्वारा अपने मन ,चित्त, इन्द्रियाँ इनको अपने वश में करके योग साधना से हरि नाम का स्मरण करके जब अलौकिक शक्ति यानी कुंडली जागरण करते हैं तब जाकर दिव्यदृष्टि खुलती है कुंडली जागरण के बाद ही मनुष्य की 3rd eye यानी दिव्य नेत्र/दृष्टि खुलती है और वह भूत ,भविष्य, वर्तमान की बातें देखकर बता देगा ।
पुरातन काल में कोई विज्ञान की आधुनिक लेबोरेट्री नहीं थी इसलिए परामनोविज्ञान को समझने के लिए ऋषियों ने योग द्वारा अपने हृदय को ही परलौकिक विज्ञान की लेबोरेट्री बनाई ! घृतराष्ट्र ने जो पूरी महाभारत सुनाई थी वह भी दिव्यदृष्टि का प्रभाव था।
आधुनिक टेलीपैथी क्या है ??
चित्त यानी मन से परे का सम्प्रेषण है टेलीपैथी ! अर्थात जब आप परचित्तज्ञान /टेलीपैथी की बात करते हैं
फैड्रिक डब्लू एच मायर्स को आप जानते ही हैं 1882 में यानी 18वीं सदी में इस विज्ञान को उन्होंने टेलीपैथी नाम दिया और बहुत से अनुसंधान भी हुए ताकि आधुनिक पद्धति में मानव मस्तिष्क और कंप्यूटर की सहायता से एक विज्ञान के रहस्य को समझा जा सके । वस्तुतः यह शोध तो ज्ञान और योग की शक्ति से ही पूर्णतः सम्भव होता है ।
टेलीपैथी काम कैसे करता है ??
जब आप शरीर की सभी ऊर्जा को subconscious /अवचेतन मन पर केंद्रित करते हैं तो आप अपने मन के बल से जिसे याद करते हैं उसे संदेश भेजते हैं थोड़ी देर में आपको कुछ दिमाग ट्रिगर करता है कि मुझे कोई याद कर रहा है या जिसे मैं याद कर रहा / रही हूँ वो मुझसे कुछ कहना चाहता है ।और आप बिना कहे सामने वाले का दिमाग पढ़ लेते हैं । यह होता है आपसी जुड़ाव से ! तब हमें संकेत मिलने शुरू हो जाते हैं।
टेलीपैथी का मिला जुला विश्लेषण परामनोविज्ञान और अध्यात्म की दृष्टि से
कहते हैं जब दो दिल आपस मे जुड़ जाते हैं तो एक दूसरे के सुख दुख का आभास हमे होने लगता है यह जुड़ाव पुत्र, पिता, माता पति, पत्नी, मित्र, सगे सम्बन्धी से हो सकता है ।
उदाहरण के लिए आपने कोई स्वप्न देखा और स्वप्न में कोई अपना संकट से घिरा मिला तो नींद खुलते ही अपने उस प्रिय का स्मरण किया । फोन द्वारा, चिट्ठी या स्वयम मिलकर कुशलता जानने का प्रयत्न किया और अंत मे आप निश्चिंत हुए।
कहने का मतलब है कि यह आभास क्यों होता है । कि कोई अपना मुश्किल में है ।या कई बार आप अपने मन की बात मन ही मन किसी को याद करके पहुंचाते हैं । और जो भी तरंगे आप अपने प्रिय को भेजते हैं उस व्यक्ति को भी वही तरंगे घेरती हैं आप दुखी होकर मन ही मन उस व्यक्ति से वार्ता करेंगे तो जो व्यक्ति आपसे दूर है और आप उसे दुखी होकर स्मरण कर रहे हैं तो उस पर भी दुःख का भार प्रतीत होगा ।
इसका प्रमाण मिलता है कि जब महर्षि वाल्मीकि सीता को व्याकुल देखते हैं तो प्रश्न करते हैं उनकी व्याकुलता जानते हैं और ज्ञात होता है कि प्रभु राम को स्मरण करके वह दुखी हो रही हैं तब महर्षि ने यह बताया कि पुत्री जब भी तुम प्रभु राम को स्मरण करो तो खुश होकर!!
क्योंकि जो तरंग तुम प्रेषित करोगी राम को भी वही तरंगे सुख या दुख का आभास कराएंगे।
यानि टेलीपैथी एल सशक्त माध्यम है । विचार भाव अभिव्यक्ति का , जो सूक्ष्म रूप में मन के भावों को मन ही मन प्रेषित करता है।
कितना गूढ़ विज्ञान है जो इंद्रियों रूप रस गन्ध से परे एक अवचेतन शक्ति से रूबरू कराता है ।

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