उसके घर मे खाने को अन्न बेशक कम था
वह गरीब था कोई अमीर ना था
सुबह उठकर रोजी रोटी को चल पड़ता
घर लौटकर 2 पैसा भी कम था
रोटी का जुगाड़ करता कि शॉपिंग
महंगे शौख पूरा करने का औकात नही था
खुशी के त्योहार को कैसे मनाता भला
दीया बाती कुछ साज ओ समान भी ठीक था
दीप जलाने को तेल की कीमत में उछाल बहुत था
महंगाई की मार और पगार कुछ कम था
रोज पुराने कपड़े पहनता आज कुछ नया तो नहीं
जरूरते अपनी भुलाकर परिवार का पेट तो पलता था
रंगीन मिठाईयों कपड़ों की ख़लिश बेशक थी मगर
उसके घर मे शक्कर बताशे मिठाई से कमतर तो ना था
वह जीता है परिवार के ख़ातिर रोजी रोटी की चिंता में
महंगाई के जालिम मार से वह त्रस्त बहुत था
कोई पूछ लें उसकी हालत या मदद को हाथ बढ़ाये
वह मेहनतकश था कोई भिखारी ना था
जज्बा अमीरों से कहीं ऊंचा रहा उसका
भीख मांगने से बेहतर मजदूरी अच्छा था
उसके घर मे खाने को अन्न बेशक कम था
वह गरीब था कोई अमीर ना था .....!!
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