मुख से क्या मैं बयाँ करूँ हर एक शब्द निशब्द
खूबी अनन्त महिमा अनन्त वर्णन करते नहीं अंत
अगर सोचे ये मन कि छंदो में करती रहूँ गुणगान
छंदो की गांठे स्वत: ही खुल खुल जाए नाथ
करूणानिधान दयासिंधु हो प्रभु अनगिनत तेरे नाम
महिमा अनंत गुण है अनंत बेअंत तूं है नाथ
किस मुख से मैं गुणगान के शब्दों को लाउं नाथ
यह शब्द ही आधार है तेरी सृष्टि का हे नाथ
जो भी चढ़ाऊँ श्रद्धा से स्वीकार कर लेना उसे
नादान अपने भक्तों को ना दूर करना स्वयं से
स्वीकार करना विनय हम आए है तेरे शरण में
हृदय के गागर को हमारे भर दो अपने प्रेम से
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