चाणक्य नीति स्त्री विरोधी है??
कॉलेज के दिनों में मैने नारीवाद और मनुस्मृति का अध्ययन किया था । बेहद अटपटा लगता था तब कि वह दौर कितना भयानक होगा जिस दौर में न जाने कितनी ही प्रथाएँ थीं। महिलाएं महिलाओं की दुश्मन हुआ करतीं थी । पुत्र की लालसा में ओझा तांत्रिको का सहारा लिया जाता था । पुत्रों को फल दूध मेवे खिलाकर लड़कियों को पराया धन मानकर उनकी उपेक्षा की जाती थी यह तो आज भी विद्यमान है कुछ पिछड़े मानसिकता के लोगों में । चाहे वह शहर में हो या गांव में। मानसिक पंगु लोगों की तदातें कम तो नहीं हुई ।
आये दिन अखबारों में , tv में देखने सुनने को मिलता ही है ।
मैं बात कर रही हूँ धर्म ग्रंथो में फेरबदल की । अब फेरबदल ही कहूंगी । क्योंकि जो ग्रंथ उस दौर के होंगे वे मूल प्रति में तो हमे और आप लोगों को साक्षात श्री हरि तो देने आएंगे नहीं । तो दौर जैसे जैसे बदला हमने हर धर्म ग्रंथ का संशोधित रूप ही पाया । फिर भी जितना हो सका अच्छे विद्वानों ने धर्म ग्रंथों को मूल ही रहने दिया। माना जाता है कि रामानन्द द्वारा रामायण धारावाहिक असल मे बिना तोड़े मरोड़े दर्शकों के सामने चरितार्थ किआ गया है । और लोग पसंद भी करते हैं किंतु अब के रामायण में कुछ हद तक बदलाव देखने को मिलता है ।
अब पुनः अपने टॉपिक पर आती हूँ ..........
चाणक्य ने अपनी नीति में महिलाओं को क्यों निकृष्ट माना।
चाणक्य ने जन्म से ही माता का सुख नहीं भोगा , मां का वात्सल्य नहीं मिला तो उनका हृदय भी कठोर हो गया होगा ।शायद इसलिए महिलाओं के बारे में ज्ञान शून्य थे ।
जिक्र आता है कि चाणक्य शरीर से हृष्ट पुष्ट थे किंतु कुरूप देखने मे थे । तो ऐसा भी हो सकता है स्त्री जाति से उनके सम्बन्ध अच्छे न रहते हों या वे स्वयं ही दूर रहते हों । यह तो उस दौर की बातें है मैं मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के आधार पर कहूँ तो यह चाणक्य का निजी मत था जिसे बिना प्रूफ किये महिलाओं के विषय मे बिना सिर पैर के विचार रख दिये। जिसका कल और आज दोनो ही दौर में कोई औचित्य नहीं था । ना है । ना रहेगा । क्योंकि
देश काल परिस्थितिया बदलती रहती है ठीक उसी प्रकार मानव( स्त्री-पुरुष) का व्यवहार ,आचार, नीतियाँ हर दौर में बदलती रहती हैं यही मनोवैज्ञानिक आधार है ।
यहाँ मैं एक एक करके चाणक्य के विचार रखती हूँ कितना सत्य और कितना मिथ्या है देखते हैं.......
आपदर्थे धनम रक्षेद दारान रक्षेध्दवनैरपी
आत्मनम सतत रक्षेत दारे रपि धनैरपि।।
( चाणक्य)
अर्थात धन स्त्री की रक्षा करनी चाहिए और स्त्री की रक्षा धन से प्राथमिक हो तो धन खर्च करके भी रक्षा करनी चाहिए और जब अपनी खुद की रक्षा का सवाल हो तो दोनों से पहले अपनी रक्षा करनी चाहिए।
यह भावार्थ कितना विरोधाभासी है मतलब आज के युग मे लोग अपनी माता बहन बेटी का इज्जत जाते हुए सामने से देखते रहे औऱ अपनी जान बचाकर भाग निकले यह तो पुरुषों के पुरुषार्थ को ही चुनौती दे डाला चाणक्य ने ! यह तो अनुचित है।
अगला श्लोक है .....
स्त्रीणां द्विगुणाहारो बुद्दिस्तासाम चातुर्गुणं
साहसं षदगुनम चैव कामोअष्टगुण उच्यते ।।
अर्थात स्त्री दुगना खाना खाती है , चार गुना दिमाग रखती है , 6 गुना साहस और आठगुना कामवासना रखती है ।
कौटिल्य का यह ज्ञान केवल उनकी स्वयं की मानसिक समझ पर आधारीत है
देखा जाए तो स्त्री पुरुष सर्वप्रथम मानव हैं और काम वासना की बात करें तो इतिहास में साक्ष्य हैं एक राजा की कई रानियाँ रखने का प्रचलन !! और युद्ध मे स्त्रियों को जीतना पुरुषार्थ समझा जाता था । अब कामातुर कौन है यहाँ ??
तो चाणक्य कैसे किसी व्यक्ति (स्त्री) को 8 गुना कामुक कह सकते हैं ।
एक एक करके सभी श्लोक का मूल्यांकन करूँ तो लेख ज्यादा बड़ा हो जाएगा थोड़े शब्दों में मेरे कहने का अभिप्राय है कि
इन उदाहरण और चाणक्य कथन (श्लोक) द्वारा स्त्री की दशा को दर्शाना है ।
क्या आप भी मानते हैं चाणक्य नीति महिलाओं के खिलाफ है तो जरूर बतायें ।
मेरा जो मत था वह स्पष्ट कर दिया ।
निष्कर्षतः चाणक्य नीति धर्म, कर्म, राजधर्म, देश उत्थान, रणनीति , राज करने की नीति , मित्र , शत्रु में भेद आदि पर बेहद उत्कृष्टकृति है किंतु ..............महिला विरोधी !!!!!

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