काम करता रहा ,ख्वाब बुनता रहा
ढाबे का छोटू बचपन को खोता रहा
अनगिनत ख्वाब और आँख में भर नमी
इस फ़िकर में पड़ा वो सिसकता रहा
घर में बीमार माँ ,ना दवाई का खर्च
तंगी भारी पड़ी कैसे रह पायेगा
कुछ बचत से कभी आँखों में भर चमक
तीजो त्यौहार महंगे बजट से बड़े
मन को मारे रुआंसा न खर्चा किया
सुखी रोटी खा उसमे गुजारा किया
उस बचत से कभी दाल-रोटी मिले
बिगड़े दिन में कहाँ कोई करता भला
छोटू का बचपन खोते माँ सब देखती
जब मोहल्ले के बच्चे गए थे स्कुल
किस मुह से कहे ढाबा को छोड़ दे
घर में तंगी हो छोटू स्कूल चल दे
वक्त की ठोकरों ने ये क्या कर दिया
पेट की भूख ने उसका बचपन छिना
उम्र से पहले छोटू बड़ा हो गया
काम के बोझ में बालपन खो गया।।
गायत्री शर्मा
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें