भावनाएँ उमङती हैं निश्छलता झलकती है
शायद किसी ने करीब से देखा होभावनाओं के बदलते रूप को
यह सच है कि-भावनाएँ उमङती हैं
माँ के लिए बेटे का प्यार जीवन भर एक समान रहता है
बेटे के लिए माँ की अहमियत धीरे धीरे कम हो जाती है
तब भावनाएँ उमङती हैं माँ की ममता का निरादर करना
दिल में छल और जुबां पर मीठे शब्द इन सब बातो से अंजान
एक माँ यह विश्वास लिए कि -उसका बेटा बुढापे का सहारा बनेगा
वह अपनी संपति बेटे को सौंप निश्चित ही बेफिक्र हो जाती है
तब भावनाएँ उमङती हैं वह मक्कार बेटा अपनी चालों से माँ को उलझाकर
दो मीठी बातो से उसके दिल पर प्रहार करता है संपत्ति पर हक जताकर
घर से बेदखल कर देता है तब भावनाएँ उमङती हैं
दर दर की ठोकरें खाकर दर्द से कराहती वह माँ
अपने जिगर के टुकङे की नफरत साथ लिए एकाकी जीवन जीती है
वह कोई शिकायत नहीं करती उसका रोम रोम बेटे के लिए मंगल कामना करता है
तब भावनाएँ उमङती हैं जा बेटा तूँ अपनी दुनिया में खुश रहना यह कहकर
वह अंतिम सांस लेती है और बेटे को आशीष देती है तब भावनाएँ उमङती हैं
बेटे के हर कृत्य को एक माँ नादानी समझ माफ करती है
कितना बङा दिल है माँ का उस ममता की मूरत को
सताने वाले क्या कभी सुकून से जी पाएंगे??
परंतु वह देवी सी माँ इस संसार से अपना फर्ज अदा कर
चल बसती है तब भावनाएँ उमङती है
निश्छलता झलकती है
गायत्री शर्मा

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