साँझ तले बीते रैना,अश्कों से भीगे हैं नैना
पलकें दर पलक झपकती है अकुलाहट ना ,दिल में चैनामौसम ने रंग जमाया है ,वो ठंढी फुहारें अंगार लगे
तपता भानू से धरा जहां ,वही धरा बना मन का अंगना
विक्षोभ हो जिस पल अपनों से ,रिसने लगे जीवन की बगिया
क्या लोभ पले इस जीवन में ,सेमल पुष्प सी ये दुनियाँ
जड़ता ने पंख पसारे हैं, सपनों के पंख बेचारे हैं
जो भोर हुआ किरणें छिटकीं ,आशाओं का तब दम निकला
निशि से घिरी रैना ढल जाये ,कोई जख्म हरा फिर हो जाये
मुरझाये चमन अन्तःमन का, दर्पण चेहरा अंजाना सा
दुनिया का रंग फिजुली है ,ना फ़िक्र रहा मिट जाने का।।
गायत्री शर्मा
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