एक वक्त होता है हर बालक के जीवन में
चैन-ओ-सुकून भरा जिसमें न भविष्य कीऔर न ही भूतकाल की चिंता होती है
वर्तमान ही उसका सबसे सुंदर पल होता है
ख्वाब-ओ-अरमानों की टोली के संग
और हंसी ठिठोली के बीच वह बालक
जब दुनिया से नादाँ होता है और
लोगो के पैंतरों ,दोहरे चरित्रों और मक्कारी से बेखबर
एक दौर बचपन का दूसरे दौर को दर्शाता हुआ
स्वाभाविक तौर पर अस्विकार्य निर्णय होगा
वक्त संवेदना ,सजीवता, और विविधता को दर्शाता है
तब हम समाज के साथ बढ़ने का लक्ष्य साधते हैं
एक बालक समाज से अंजान खुद में मगन लेकिन
जब हिस्सा बनाया जाता है उसे हर दायित्व का
कर्तव्यों का भार वहन करने को सीख देकर
लड़का और लड़की के बीच का भेद बताकर
ऊंच नीच जाति और संप्रदाय के गंदे खेल में उलझाकर
हर तरफ से स्व हितपोषण की बात कहकर
षड्यंत्रों ,मक्कारियों के बीच फंसाकर
संस्कारों ,मर्यादा के नाम पर प्रहार कर
उस कोमल मन को यह बोध कराया जाता है
वह भी दोहरा चरित्र अपना ले मक्कारी सीख ले तब
उसे घृणा हो जाती है इस दोहरे चरित्र वाले समाज से
न खुद समझ पाता है न किसी को समझा पाता है
इस दरमियां कश्मकश का वो दौर जाने
किस दिशा में बहा ले जायेगा उसे
फर्क सिर्फ इतना होता है जिस समाज से
एक अबोध बालक आहत होता है
परंतु वह अपने सिद्धान्त खुद तय करता है
वह अनैतिकता को न अपनाकर
समाज के लिए कुछ कर गुजरना चाहता है।
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