प्रार्थना मौन होती है दिल मे हलचल सी होती है
हर एक शब्दों से मालिक को नमन अरदास होती है
रहमतें लाख है उसकी जरा दिल हुजरे को खोलो
वो दृष्टिगोचर नहीं होता वही एकांत मिलता है
सुखद आगोश में खोए , बिताते दिन जो मौजो में
जिसे तुम भूल जाते हो वही महसूस होता है
बादलों का जो आना हो , जिंदगी दुख थपेडों से
पलक आंसू बहाते हो उसे वो कुबूल करता है
चढ़ावा आंसुओं का भी सुदामा, शबरी सा जो हो
दुर्योधन के मेवे छोड़ , विदुर घर साग खाते हैं
पुरातन और पौराणिक कथाओं में जिसे सुनते
तुम्हारे सामने तो नहीं मगर वह साथ रहता है
कोई नेकी करे तुमसे , समझ जाना प्रभु रहमत
पुकारोगे अगर प्रभु को , वो दौड़े आ ही जाते हैं
प्रत्यक्षम किम प्रमाणम है , ये कहना भी फिजुली है
कि ईश्वर अंश हैं हम सब , उसी का नूर फैला है ।।
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