नियति से हार मत मानो !
प्रयासों के गढ़े पत्थर हमे मोती बनाते है
प्रगाढ़ इच्छा के बल बूते जहाँ मे जीत पाते हैं
नहीं क्षमता यदि तुममें लेख नियति बदलने की
बदलकर कर्म को अपने लेख टाले विधाता का
परमारथ के पथ पर
इच्छाएं पूर्ण होती है प्रबल तब भाग्य होता है
करो शुकराना मालिक का ,वो नेमत बख्श देता है
बहुत अवसर मिले होंगे ,खुशी में लीन होने को
बढ़ो परमार्थ सेवा में तो , जीवन तर ही जाता है ।।
सुखः का सवेरा !
सज़ा जीवन है ये अपना जो सेवा धर्म वंचित हो
प्रयासों की विफलताएं अगर रोडे लगाती हों
नहीं रुकना नहीं थमना मनोबल दृढ़ बनाने तक
चलोगे चीरकर दुःख तो सवेरा सुख का आएगा।।
खुशियाँ स्थायी नहीं !
क्षणिक सुखों में हम अक्सर उलझे उलझे से रहते हैं
माया के लोलुपताओं में जीवह्वा स्वाद पर मरते हैं
गति हमारी अंत काल यम पाश में जकड़े जाना है
माया ममता लोभ ना छोड़े लिपटे लिपटे रहते हैं।।
दुश्मन का सत्कार
घर पर आए दुश्मन को भी अतिथि ईश्वर रूप कहें
कैसे उचित हो इज्जत देना गर दीमक से लग जाये
छिन्न भिन्न करने की साज़िश शातिर चालें चलते जो
कहो भला कैसे हम उनको अपने ही गमख्वार कहें।।
माता पिता से बढ़कर कोई नहीं
ख्याल माँ-बाप का रखना उनसे बढ़कर न कोई है
भाई भाई के खूनी बनके रिश्ते तार करते हैं
प्रलोभन लालचों में रिश्ते अक्सर नष्ट होते हैं
बिना स्वार्थ के केवल माँ बाप ही साथ देते हैं।।
वक्त का खेल
वक्त का जो पहिया है ना तेरा है ना मेरा है
क्यों उछाल मारता है दरिया भी तो खारा है
ना रह गुरुरो शान में औकात अपनी बतलाकर
खाली हाथ आए हो , तो खाली हाथ जाना है ।।
सम्बन्धों की गांठ
डिगा ईमान उनका था दम्भ लालच के चक्कर में
बहुत सहते रहे हम भी कि रिश्तेदार अच्छे हैं
छूट इतनी मिली उनको कि ख़ंजर पीठ पर घोंपा
करके एहसान हमने भी गांठ सम्बन्धों का खोला।।
धोखेबाज़ रिश्तों पर
दूर रहो तो ही अच्छा है लम्बी कतारें क्या करना
रिश्तेदारों के चक्कर में खोखली ढींगे क्यों भरना
बेशक हो परिवार भरा रिश्ते नातों के छाँव में
बिछुआ जैसी वृति हो तो उसका परित्याग जरूरी है।।
मक्कारी की रिश्तेदारी
लालच और मक्कारी जिनके रग रग में पोषित होतीं
चुगली निंदा घृणित कार्य से अपनों को शोषित करते
विमुख होकर के सदाचार से नीति उलंघन करते जो
ऐसे झूठे मक्कारों को क्यों हम रिश्तेदार कहें??

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