रामायण में प्रसंग आता है कि एक बार माता सीता सुहाग की निशानी सिंदूर लगते हुए नजर आईं । जैसे ही हनुमान ने यह दृश्य देखा तो मन मे एक अबोध बालक की तरह जिज्ञासा हुई कि पता लगाया जाए कि माता सिंदूर क्यो लगाती हैं ?
अब उत्सुकतावश हनुमान ने प्रश्न किआ कि मां "आप हर रोज अपनी मांग में सिंदूर क्यों लगाती हैं .."!
हनुमान के इस प्रश्न से माता को हंसी आई और वो मुस्कुराते हुए बोलीं कि " पुत्र मैं सिंदूर इसलिए लगाती हूँ क्योंकि इससे प्रभु श्री राम प्रसन्न होते हैं और उनकी लम्बी उम्र बढ़ती है ।
ज्यों ही हनुमान ने यह जाना कि प्रभु प्रसन्न होते हैं तुरन्त उन्होंने कहा कि अगर मैं पूरे शरीर मे सिंदूर लगा लूं तो क्या प्रभु मुझसे भी प्रसन्न होंगे माता "!
हनुमान को माता ने तुरंत जवाब दिया क्यों नहीं पुत्र ...." लेकिन तुम सिंदूर लगाओगे ??
तो हनुमान ने कहा कि माता मैं अपने प्रभु को प्रसन्न करने के लिए सिंदूर जरूर लगाऊंगा।
अगले दिन सभा पुनः आयोजित होती है ।
सीता - राम की जोड़ी पहले राजसभा में हजारों कामदेवों को लजा देने वाली भव्य और मनमोहक लग रही थी। राजदरबार में किसी आवश्यक विषय पर मशविरा किआ जा रहा था ।
इतने में हनुमान राजसभा में पधारे प्रभु को निहारते हुए हाथ जोड़कर प्रभु के समीप बढ़ते गए ।
हनुमान का यह लाल रूप देखकर दरबारी सहित लक्ष्मण, भरत , शत्रुघन हंस पड़े ।
हनुमान को अपने मान सम्मान का कोई लाज नही रहा क्योंकि उन्होंने प्रभु की भक्ति पाई।
जब प्रभु श्री राम ने हनुमान से प्रश्न किआ कि हनुमान तुम इस तरह रूप बनाये राजसभा में .... कोई खास बात??
तो हनुमान ने कहा " जी प्रभु जब मैंने माता सीता को सिंदूर लगाते देख प्रश्न किआ कि वो सिंदूर क्यों लगाती हैं तो माता ने कहा कि इससे आपकी उम्र बढ़ती है और आप प्रसन्न होते है " तो प्रभु मुझपर आप अनुग्रहित हों !
हनुमान की बात सुनकर राजसभा में उपस्थित लोग भावविभोर हो गए और हनुमान की भक्ति की सराहना करने लगे।
प्रभु राम ने भक्त शिरोमणि की उपाधि प्रदान की और आशीर्वाद दिया कि मंगलवार के दिन तुमने मुझे प्रसन्न किआ है । जो भी मनुष्य मंगलवार को तुम्हे सिंदूर चढ़ाएगा या सिंदूर चढ़ाने में मदद करेगा उसकी हर इच्छा पूरी होगी और मेरा स्नेह और प्रेम उसे प्राप्त होगा ।
हनुमान प्रभु के आशीर्वाद से अनुग्रहित हुए और इसलिए मंगलवार को लाल रंग चढ़ाया जाता है।
कहते हैं कि भक्ति और पागलपन में कोई अंतर नहीं होता हैं यह सत्य है इसलिये भक्त और भक्ति दोनो ही प्रभु को प्रिय हैं ।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें