एक बार काशी नरेश ययाति नें ऋषियों का अपमान करके अपने बल और शौर्य के मद में चूर होकर रघुकुल के सम्मान को ठेस पहुंचाया था और इस दृष्टता के कारण प्रभु राम ने शपथ लिए की काशी नरेश को उनकी दुष्टता का दण्ड देंगे ।अब अपने प्राण बचाकर राजा ययाति यहाँ वहाँ भागे अंततः उन्होंनेे छल से अंजना के घर आश्रय लिया जो हनुमान की माता थी। और शरणागति की रक्षा का वचन लेकर माता को प्रतिबद्ध कर दिया।
प्रभु राम ने भी हनुमान को माँ के पास भेज दिया कि पहले माँ पुकार रही हैं तुम मेरी सेवा छोड़ो और माँ की आज्ञा मानो!
यहाँ हर तरफ से हनुमान पर ही। तलवार लटक रही थी ।
जब हनुमान कुटिया में गए तो ययाति को देखकर प्रभु राम को सौंपने की बात कही तो माता ने शरणागति की रक्षा के वचन में बांधकर हनुमान को विवश कर दिया। अब गुप्तचरों से ज्ञात हुआ कि हनुमान ने विद्रोह कर दिया है । और राम की सेना हनुमान की ओर बढ़ने लगी। हनुमान ने सैकड़ों सेना को मार गिराया । और राजा ययाति हनुमान की प्रसंशा करने लगे तब हनुमान को क्रोध आया और राजा को बोला अपनी चिंता करो ना कि मेरा गुणगान करो ।
ऐसे में राजन ने पूछा कि ....." हनुमान" आप ही बताइए मुझे क्या करना चाहिए?? तब हनुमान ने कहा ....."
राम से बड़ा राम का नाम है राजन आप कुछ समझे!!
राजन को समझ नहीं आया तब विस्तार से कहा हनुमान ने कि
राजन" जिस प्रकार संकट मे घिरकर हम अपने से बलवान से बचने के लिये उससे भी बड़े बलवान के पास जाते हैं वैसे ही प्रभु से भिड़ना आसान कहाँ ?? इसलिए मेरी मानो तो राम से बड़ा उनका नाम है वही नाम आपकी रक्षा करेगा।
थोड़ी ही देर में प्रभु राम दक्षिण दिशा में पहुंचते हैं तो सैनिको की लाशें देखकर बेहद क्रोधित हुए
अब हनुमान माता के वचन को निभाएं या प्रभु से शत्रुता । क्योंकि उन्होंने प्रभु के शत्रु को शरण दिया ।
और उसकी रक्षा के लिए वचन में बंध गए।
दूसरी ओर प्रभु। राम की भी दुविधा भारी थी कि अब हनुमान को मैने ही मेरा कार्य छोड़कर माता की आज्ञा पालन का आदेश दिया था ।
और यदि मैं हनुमान को प्रिय भक्त जानकर छोड़ दूंगा तो हमारी ही सेना में विद्रोह हो जाएगा और राजसिंघासन संकट में आ जायेगा
यह विचार करके प्रभु राम ने राजधर्म निभाने का फैसला किया ।
सीता का त्याग करने का विचार भी इसी राजधर्म को निभाने की चुनौती से उतपन्न हुआ था।
अब प्रिय भक्त हनुमान से युद्ध भी इसी राजधर्म के पालन करने का परिणाम था ।
भक्त और भगवान की लड़ाई में हनुमान ने प्रभु से विनती की कि मुझे क्षमा करें मैं माँ की आज्ञा से बंधा हूँ ।
वही राम ने राजधर्म निभाने का तर्क दिया ।इस तर्क वितर्क का क्या परिणाम होगा विधाता ही जाने।
सरयू नदी में खड़े होकर काशी नरेश राम नाम का जप कर रहे थे ।
राम ने लक्ष्यभेदी बाण ताना और बाण से तीर निकलकर राजा के चारों तरफ राउंड लगाकर अंतर्ध्यान हो गया ।
प्रभु के प्रतिज्ञा के 3 बाण में 2 शेष थे ।
अब काशी नरेश पुनः राम नाम जपते हुए दूसरे तीर को पुनः राउंड लगाकर अन्तरध्यान होते देखा तो हनुमान से बोले!
" पवनपुत्र अभी प्रभू का एक बाण और शेष है अब मैं क्या करूँ तो हनुमान ने कहा....."राजन".... अब आप बोलो
".......राम लक्ष्मण जानकी जय बोलो हनुमान की ......."
अब राजन ने ठीक ऐसा ही किआ ।
".......राम लक्ष्मण जानकी जय बोलो हनुमान की ......." जप करने लगे
अब प्रभु स्वयं पर संदेह करने लगे कि अब हनुमान तीसरा तीर भी निष्फल कर दे तो मेरी प्रतीज्ञा विफल हो जाएगी।
गुरुदेव वशिष्ठ ने हनुमान हो कहा कि राजा को सौंप दो ।
हनुमान ने गुरु को यह तर्क दिया कि मैं संसार को राम नाम की शक्ति का भान कराना चाहता हूँ अब उन्होंने राजन के लिए एक युक्ति निकाली कि प्रभु का तीसरा तीर ऋषियों के अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए है तो क्यों न ऋषि से क्षमा ही मांग लें।
अब हनुमान ने कहा राजन " आप गुरु विश्वमित्र का चरण पकड़ लो माफी मांग लो तो ही आप का कुछ हो सकता है।
राजन ने ठीक ऐसा ही किआ ।
प्रभु एक तरफ प्रत्यंचा चढ़ाए हुए हैं और दूसरी तरफ क्षमा याचना का दृश्य
गुरु विश्वामित्र ने नरेश को क्षमा किआ और राम को आदेश दिया कि मैंने क्षमा कर दी है अब तुम्हारी प्रतिज्ञा पूरी हुई।
राम का क्रोध इस बार नरेश से हटकर हनुमान पर आया ।
राम नाम का जप करते हुए हनुमान ने प्रभु का वॉर स्वीकार करने से पहले यह सत्य बताया कि प्रभु...." मैने आपके सैनिकों को मारा नहीं है मेरे अष्टसिद्धि के प्रभाव से उन्हें मूर्छित अस्त्र से मूर्छित किआ है । आपकी अनुमति हो तो मैं इनको जीवित कर दूं ....??
प्रभु ने कहा "अवश्य"!
अब चेतना अस्त्र के प्रयोग से हनुमान ने राम की सेना को स्वस्थ कर दिया ।
प्रभु ने हनुमान पर प्रसन्न होकर वरदान मांगने को कहा!
तब "हनुमान ने कहा "...कि प्रभु जब भी कोई व्यक्ति राम नाम का गुणगान करे तो आप उसके समस्त पाप , इष्र्या, द्वेष, और मद को भुलाकर अपनी कृपा का पात्र बनाएंगे ..."!
तब प्रभु ने हनुमान को आशीष दिया कि राम नाम की महिमा इंसान को भवसागर से पार लगाएगा।
तो अंत मे निकला ये परिणाम राम से बड़ा राम का नाम।

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