एक बार माता सीता अपने कक्ष में आइने के समक्ष बैठकर एकटक अपना प्रतिरूप निहार रहीं थी । उसी क्षण प्रभु राम कक्ष में पधारते हैं तो क्या देखते हैं कि सीता आइने के सामने बैठी कुछ सोच रही हैं
।
प्रभु ने प्रश्न किआ कि सीता " तुम इस तरह क्या सोच रही हो ! सीता जी ने उत्तर दिया कि "प्रभु मैं कुछ सोच नही रही थी मैं तो अपने भाग्य की सराहना कर रही थी कि मुझे अपजैसा पति मिला ।
जो धर्म का प्रतिरूप है और मुझे सम्मान देने वाले रघुवीर को मैं हर जन्म में पति के रूप में चाहूंगी ।
तब राम ने उत्तर दिया कि सीता सम्मान तो उसी को मिलता है जो सम्मान देता है और तुम तो मेरी प्रतिरूप हो हम दोनों एक दूसरे के बिना अपूर्ण है ।
माता को बराबरी का यह सम्मान उनके मन में भय उत्पन्न कर दिया । उन्होंने अनहोनी की चिंता जाहिर की कि कल को किसी की बुरी नजर लग गई तो हमारे रिश्ते में कोई दरार ना आ जाये ।
प्रभु ने बहुत सुंदर जवाब दिया । उन्होंने कहा " सीता किसी भी मनुष्य की दृष्टि कुदृष्टि नहीं होती । जो कुछ होता है वह नियति निर्धारित होता है केवल लोग इसे बदनसीबी अथवा कुदृष्टि का नाम देते हैं । और सीता जी की आशंका वहीं मिट गई ।
वास्तव में देखा जाए तो मनुष्य को भगवान का रूप मानते हैं कि ईश्वर अंश जीव अविनाशी ! तो जीव भगवान का रूप है तो उसकी दृष्टि कुदृष्टि कैसे हो सकती है।
इस सत्य को न जानकर हम ओझा और तांत्रिकों के पीछे पड़कर अपना समय और ऊर्जा नष्ट कर लेते हैं। हमें चाहिए मानवता को पोषित करें और अंधविश्वास से दूर रहें।

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