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मुक्तक राष्ट्र भक्ति

 राष्ट्र भक्ति

कलाकारी अदाकारी हुनर कुछ खास जिनमे हो 

मुकाम ए शौहरते सम्मान ओहदे खास उनके हों 

कला का धर्म ना कोई नहीं मजहब की बंदिश है

अनेकता में एकत्व फले ये हिंदुस्तान बेहतर हो।। 

गांधी जी 

वृति हिंसक हो तो धरती पाप के बोझ ढोती है 

आजादी की तड़प हुंकार चींखे मन में गुंजती है

जंग_ए_आजादी में घेरे लुटेरों और फिरंगियों को

अंग्रेजो के वस्त्र स्वाहा कर बापू पहने धोती हैं।


वीरों के सम्मान में

आजादी के सिर-मोर-मुकुट जन-मानस में जो रमते हैं,
निज स्वार्थ से ऊपर उठकर जो राष्ट्र हितैषी होते हैं,
सम्मान में अपने देश के खातिर शत्रु से टकराएं जो,
करबद्ध नमन उन वीरों को जो मातृभूमि पर मिटते हैं।।

राष्ट्रीय एकता पर
प्रेम ही प्रेम है जग मे , ना पालो नफरतें दिल में
पशु ,पक्षी, वृक्ष ,फूलों , से सीखो कुछ हुनर खुद में
विधाता ने विविधता से , सजाया है जहाँ को खुद
आदायगी करके ऋण अपना ,करो जन्नत जहां को तुम।।

कवि और लेखक का धर्म

राष्ट्र के हित की बातें हो सामाजिक आपबीती हो
गीत गजलों में कविताओं में केवल बात सच्ची हो
सरल अनुपम मनोहर वीर और श्रृंगार अद्भुत है
गढ़ो जब गीत गजलों को फुहड़ता की ना बातें हो।।


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