ये त्योहारों का सीजन अग्रिम खुशियां लाता है
और ये मशगूल रखकर वर्क लोड बढ़ाता है
लड़कों का काम क्या है पूछे आखिर उनसे भी
साफ सज्जा में कौन कितना परिश्रम करता है।।
जालों से भर गई है दीवारें कोने कोने तक
नींद आलस्य छोड़े फुरसत ना है सोने तक
और ये फर्श टाइलें चमके कि ये जिद ठान लिये
अब तो एक धूल कण मिट्टी जमे ना दीवारों तक।।
बचके रहना पेड़ो और दूध मिष्ठानों से
कोई आसार नहीं कि शुद्ध है घर के खाने से
भारी तादातों में है मांग मिलावट का बाजार
घर पर ही बनाना हर पकवान इस दिवाली में।।
भूख के पटाखों में असहायों की पीड़ा जानी है
किसी की जिंदगी गुलजार किसी की पीर घनी है
पूछती है ये गुंजन हे विधाता क्यों ऐसा जगत रचा
किसी का उजला जहां तो किसी की दिवाली काली है ।।
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