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मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी आत्महत्या का कारण तो नहीं?

 



अवसाद से आत्महत्या का चक्रव्यूह!  क्यों गढ़ता है  इंसान ?? 

आज   युवा  आत्मदाह  की ओर अंजाम पर पहुंच रहे हैं हमने सुशांत सिंह राजपूत केस तो सुना ही होगा। अब यह साजिश थी या आत्महत्या यह तो विवादास्पद रहा है क्योंकि न्याय की लड़ाई  बीरबल की खिचड़ी नहीं है। 


 सब कुछ पा लेने वाला भी जब  निराश हो उठता है तो दुख होता है  इस पूरी आबादी का एक ऐसा तबका जो संसाधनों के पीछे भाग रहा है नाम, रुतबा, आराम के लिए संसार के मृगमरीचिका में दौड़ रहा है  यह सब क्या है ?? क्यों  प्रेरित करता है यह अवसाद  जीवन दाह को !

 बहुत विडंबना है समाज की  आखिर  मुस्कुराहटों के पीछे भला जिंदगी की शाम का इन्तजार क्यों ........???



कहते हैं कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता , किसी को जमीं तो किसी को आसमां नहीं मिलता ।। "यह जीवन तो कुदरत की इनायत है  सृष्टि का आधार है मानव , सृष्टि का श्रृंगार है ,  मानव से ही यह धरती है , मानव से मानवता है ।।


  इंसान की माकूल अहमियत बताते हैं हमारे वेद-शास्त्र और महापुरुष  , जो समय - समय पर मानव जाति का प्रतिनिधित्व करने आते हैं  बुद्ध,विवेकानंद युवा प्रेरणा बनकर उभरे । 


कैसे जानें कि हम कौन हैं ? किसलिए आये हैं ? और हमें  कहाँ जाना है ? दार्शनिक विचारों से प्रेरित समाज को दिशा देने को महापुरुषों का आना हुआ ।

यह बहुत ही चिंताजनक विषय  है आखिर क्या कमी रह गई है जीवन मे कि हम अपने अस्तित्व से लड़ने की तैयारी करने लगते हैं -  इतनी तैयारी कि खुद को अवसाद के चक्रव्यूह में डालकर योजनाबद्ध तरीके से बनाई गई मानसिक दुखों  के संसार में विचरण करने को बाध्य हो जाते हैं ।  क्या हमने सोचा है कि ये सब भ्रम  जाल क्यों है ? क्यों ना इसे मात देकर जिंदगी की ओर  बढ़ा जाए ।  आप कितने भी बड़े विद्वान हों , लेखक या  कलाकार हों  अवसाद का सामना कौन नहीं करता , चुनौतियां कहाँ नहीं है , कोई बताए किस दुनिया में शांति है अमन-ओ-चैन है । जो है  सो केवल  अपने परिश्रम और जिंदादिली से परिवर्तन की बयार लाने में है ।  अन्यथा जीवन नीरस बन जायेगा । जीवन को अवसर की तरह लें ना कि निराशा में झोंक दें । इस चीज का कोई औचित्य भी नहीं है ।

अवसाद के  पीछे कुछ तो कारण होगा ? - अक्सर हम घर परिवार से दूर रहने को बाध्य होते  हैं, पढ़ाई , जॉब , कैरियर के सिलसिले में ऐसा संभव है।  किन्तु कारण सिर्फ यही नहीं कि हम दूर हैं । अरे! आपने इतना बड़ा फैसला लिया है घर से दूर रहने का तो  आपकी मानसिक क्षमता इतनी कमजोर कैसे हो सकती है कि आप अवसाद में घिर  जाएं यह तो वही बात हो गई कि पानी का स्तर कम होने की वजह से एक मछली उसके सतह पर किनारे आकर अपनी जान से हाथ धो बैठे । आखिरी सांस तक प्रयास तो बनता है ना।  केवल  इतना ही  नहीं  घरेलू हिंसा , मारपीट,  मजदूरों का शोषण, प्राकृतिक आपदाओं से  फसलों की बर्बादी ,  दहेज, आर्थिक तंगी,  मंदी का सामना , दिवालियापन, अफसरों द्वारा सताया  जाना , भ्रष्टाचार को प्रेरित करना आदि अनेकानेक ऐसे फैक्टर्स हैं जो अवसाद को दावत देते हैं । तो क्या  मानव जीवन को ही खत्म कर ले !! यही होना चाहिए क्या  ??? और क्यों???

यह  कोई समस्या का समाधान थोड़ी है । जीवन है तो समस्याएं भी होंगी , आपके रास्ते मे कांटे हैं तो फूल भी खिलेंगे , गहन रात्रि है तो सूर्य भी उदित होगा । यह घटनाक्रम पूर्व निर्धारित होता है ।   हम  क्यों जीवन से हार मानकर  बैठ जाएं ??? यह तो उचित नहीं !


मनोवैज्ञानिक कारण क्या है ---- ?  मेडिकल भाषा मे मानसिक असंतुलन और डिप्रेशन का  मुख्य कारण हमारे मस्तिष्क में स्रावित न्यूरोट्रांसमीटर्स हार्मोन के कमी से होता है  जब एक व्यक्ति महिला/पुरुष  स्वयं से अति नीरस हो जाते हैं कि उनके आसपास का वातावरण भी गलघोटू प्रतीत होने लगता है और तब वे खुद को अकेले अपने निराशावादी दुनिया मे कैद कर लेते हैं  । मन का  गढ़ा मानसिक कैदखाना कितना अंधियारा भरा होगा  यह प्रत्येक इंसान की अलग- अलग मानसिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है जो  जिंदादिल शख्स् होगा वह कुछ पल के अवसाद को मात देकर निकल जायेगा या फिर  गहन अंधियारे में खो जाएगा । यह परिस्थितियां इंसान स्वयं बनाता है ।

जब हम अपनी मानसिक स्थिति का आकलन कर पाने में खुद को कमजोर समझने लगते हैं तो  दुनिया से दूरी बनाकर अवसाद के शिकार हो जाते हैं । भूख ना लगना  अथवा  अधिक भोजन करना , कभी खुलकर हंसना , कभी आहत होकर  फुट-फुटकर रोना ,  वंशानुक्रम , अथवा परिस्थितिजन्य कारक  , कुछ भी सम्भव है जो अवसाद को मजबूत करता है ।

खोए-खोए से रहना , किसी से बात न करना , कुछ भी अच्छा ना लगना  कुल मिलाकर हमारे मस्तिष्क के हार्मोन बैलेंस में नहीं रहते  और अवसाद की प्रबलता आत्महत्या तक भी पहुंच  सकती है  इसमें कोई शक नहीं ।


युवा पीढ़ी इतनी निराशा क्यों ?---- यह समय तो खिलने का होता है , जीवन मे नए सपने , भविष्य बनाने का होता है खुश रहकर अपनों को खुशी देने का समय है , अपनी ऊर्जा को एक आयाम देने का समय युवावस्था है  किंतु दुखद: , हमने अपने विरासत  में क्या पाया क्या खोया महज एक सवाल बनकर रह गया है  खैर! जब सूर्य उदय होता है  तो समस्त अंधियारे को अपने मे समेट लेता है , जब दीपक जलता है तो एक लौ पूरे कमरे को रौशन कर देता है , अर्थात अंधियारा कितना भी गहन क्यों ना हो  मानव के हौसलों से बड़ा नहीं हो सकता    समाज ही उदाहरण है समाज ही सबक ! जो आया है इस जहाँ में अपने हिस्से  का सुख-दुख साथ लेकर आता है ।

आज हमारे अपने क्यों हमें आत्महत्या जैसे निराशावादी कृत्य से रोक पाने में लाचारी व्यक्त करते हैं  । युवा वर्ग की कामयाबी या  असफलताओं का श्रेय किसे दिया जाना चाहिए यह बहस तो बढ़ती ही जाएगी कोई हल नहीं निकलेगा , सरकारी व्यवस्था हो या नौकरियों में धांधली , पूर्वजों से प्राप्त विरासत हो या पूर्व में छाई कंगाली ।

एक पल को मान लेते हैं कि सुख संपत्ति ही सुखी जीवन का राज है  ' तो क्या जितने फ़िल्म स्टार , अफसर, और सामाजिक प्रतिष्ठित लोग हैं जो आत्महत्या  से गुजर जाते हैं क्या कमी होती है उनको ? क्या रुतबा,पैसा,परिवार नहीं है ? फिर क्यों ऐसे कृत्यों को अंजाम मिलता है ।

इसका कारण है कमजोर मानसिक स्थिति, चकाचौंध, अव्यवस्थित जीवनशैली, होड़, प्रतिस्पर्धा,  अपमान , आक्रामकता , जो मानसिक आघात पहुंचाने के कारक होते हैं ।

युवा  पीढ़ी तमाम ऐसे समस्याओं को गले लगाकर जी के को बाध्य है  और जनरेशन गैप भी उनके मानसिक स्तर को आंकलित नहीं कर सकता  तो कैसे पता चले कि जीवन से निराशा की वजह क्या है  । अब तो एकल परिवारों ने एकाकी रास्ता चुना है तो एकाकी रहने के कारण फितूर भी आते होंगे मन में  और यदि आप दिशाभ्रमित हो गए तो आपकी  नैया  भगवान भरोसे ! घर के बुजुर्ग आपके काउंसलर नहीं होंगे  । आज आपको मॉडर्न काउंसलर , मनोचिकित्सकीय परामर्श पर निर्भर रहना होगा ।


आत्महत्या की बली बेदी ----  चिंता, शोक, व्याकुलता, कलह, बीमारी, अपमान, स्वाभिमान को ठेस, और कमजोर मानसिक स्थिति यहाँ तक तो समझ आता है अब  कोई  खुद की बलि दे देगा यह कैसे संभव है ?? क्या जिंदगी प्यारी नहीं ? हमारे अपने जिनका हम एकलौता  सहारा हो सकते हैं क्या उनकी कोई कीमत नहीं ??

यह सवाल इस समाज के लिए  हो या मनोरोगी के लिए दोनों के लिए ही मंथन का विषय है ।

मनोरोगी क्यों अपने आप को इस हद तक निराश पाता है कि खिलने की उम्र में  बुझने को अमादा रहता है।

जो कलियां खुद डाल से टूट जाये तो मलाल नहीं होता  किन्तु जो जीवन खुद को ही समाप्त कर देना चाहे उसे कौन रोक सकता है।  एक पल को आप किसी को साहस से सकते हैं , उसकी मदद कर सकते हैं किंतु उसके सोच पर विराम नही लगा सकते । जैसा हमने देखा  मशहूर एक्टर सुशांत सिंह  जो कि 6 महीने से अवसाद से ग्रस्त थे और कुछ समय से  अवसाद की दवाईयां लेने से  अवॉइड करने लगे थे  सिर्फ वे ही नहीं देश के तमाम युवाओं की कहानी है जो लोग अवसाद का ट्रीटमेंट ले रहे होते हैं यानि जब तक आप दवा लेते है। तो आपके मस्तिष्क के रसायन बैलेंस रहते हैं और अवसाद को  नियंत्रित करते हैं  किंतु कब तक ? प्रश्न यह है कि एक ऐसा मध्य का रास्ता निकले जो इन दोनों के बीच से होकर गुजरे ! या तो जिंदगी या फिर मौत ! अब इस दरमियाँ हल कहाँ है ??

क्या कमी थी उस शख्स को जो दुनिया से निराश हो गया  गहन निराशा ने  घेर लिया  । सब कुछ पाकर भी कुछ नहीं पाया । यही तो समझना है । 

 आज , "विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस " पर कुछ भाषणों, व्याख्यानों से माहौल शान्त  कर लेते हैं किंतु देश के युवाओं के मन मे जो हलचल है उसे  कैसे शांत करेंगे  ? हम अपने मानसिक स्वास्थ्य को अनदेखा कर के चलते हैं इस पक्ष को भयंकर बीमारी नहीं मानते हैं लापरवाह रवैया से चिंता या अवसाद खत्म होने की फिरात् में होते हैं पर ऐसा होता नहीं है । आज मनोचिकित्सकों की संख्या देखकर ही जान सकते हैं कि कितना कमतर हम मानसिक स्वास्थ्य के लिए सचेत हैं । और घटनाओं के घटित होने का इंतजार करते रहते हैं । जब हम ऐसे विभत्सना समाज मे देखते हैं तो पछताने के अलावा हाथ कुछ नहीं आता।  और तब ख्याल आता है कि वाकई जिंदगी बोझिल हो गई है ।


जिंदगी  की करवटों में बेचैनी बहुत थी

आंखों में आंसूओं का सैलाब बहुत था

कुछ तो कमी थी जो जिंदगी  हार गई

मनोबल को पंगु करके मौत जीत गई ।। 


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