मैं साले को माफ ना कर सका तो,बीवी ने मेरी रिश्तेदारियां त्याग दी
मैं भाई भांजों के साथ खड़ा रहा तो बच्चों ने मुझसे बगावत कर लिया
जिंदगी भर अड़ियल रहा मैं एक अपमान के कारण और साले के अपमान को मैं भूल ना सका
अपने रिश्तेदारों के लालच धोखा तक को नजरंदाज किया
और अपने ही ससुरालियों के दुर्व्यवहार को गुनाह मान लिया
खूब नेकी किया रिश्ते नातों को निभाकर जानता हूं अपना घर मैं संभाल ना सका
कितना बेबस हूं आज किसी से कुछ कह नहीं सकता मर्द हूं खुलकर रो भी नहीं सकता
मां की कसम हैऔर रोल मेरा उद्धारक का है इस खता से घरवालों की नजर में मैं विलन बन गया
मत करना ऐ दोस्तों तुम ऐसी खता ज्यादा अच्छा बनने का हो शौक तो कोई बाबा ही बन जाना।।
खुशियों से भरा हो लाखों पल ,कहीं नैन नमी से युक्त रहे झरझर बरखा जो बून्द पड़े , फिर भी अंगना हो अनल तले नभचर ख़ग दाना- दाना को ,अन्न नीर बिना जैसे तरसें विचरे नभः में पंखे लहरा , उन्मुक्त गगन से दूर चले जो क्षितीज दिखे पंखों के परे ,भानू किरणों से तपता रहा अंकित जो करूँ दुःख का बादल ,चहुँ ओर घिरे पर भीग रहे ना उड़ पाया न ठहर सका, हर तरफ ही नीड़ तलाश रहा बेबसी के काले बादलों ने ,सपनों की उड़ानें रद्द कर दी चंचल ऋतुओं का क्या कहने,बेवक्त मिजाज बदल बैठे बेमानी लगे सावन भी उसे ,वो मयूर नहीं जो थिरक सके पंखें भीगी नम नैन हुए, किस ओर दिशा में नीड़ बसे। गायत्री शर्मा

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