एक समय की बात है एक छोटे से कस्बे में मांसाहारी लोगो के बीच एक विष्णुभक्त परिवार रहता था उनके घर मे सुख समृद्धि इतनी थी कि किसी के आगे भीख ना मांगना पड़े और सभी हंसी खुशी गुजर बसर कर रहे थे कि रामानन्द के घर एक रिश्ता आया उनकी बड़ी बेटी नेहा के लिए ।
अब नेहा इस बात से अनजान थी कि कोई शत्रु उनकी खुशियों में आग लगाने के मनशे से रिश्ता भेज रहा है । जब उसे यह बात अपनी माँ शोभा से पता चली तो उसने माँ को चेताया कहा...." माँ ....... तुम जानती हो कि मेरे लिए जो रिश्ता भेजा है वह हमारे दुश्मनों की चाल है पापा को समझाओ कि वो उनके झांसे में ना आये और कह दें कि मैं अपनी बेटी का रिश्ता अपने दम पर तलाश करूंगा!
नेहा के तेवर और ऊंची आवाज में बोलते हुए सुनकर उसके पिता रामानंद अपने कमरे से उठकर आये और नेहा को जोर से डांटा!
ए लड़की चुप हो जा ..." तू मुझे बताएगी कि किसके कहने में आना है और किसकी बात माननी है ।
माँ के साथ मदद कर और जाते जाते शोभा को भी खड़ी खोटी सुना दिया !
मेरी प्यारी पत्नी देवी आप प्लीज बच्ची के भाव मत बढ़ाइए । अगर आपको उसकी फिक्र है तो कीचन का कुछ काम धाम सीखा दो उसके काम आएगा ।
अब सब के सब खामोश हो गए रामानन्द की डांट आखिर पितृसत्ता की चाबुक है जिसका चलना कोई रोक सकता है भला ।
नेहा फूट फूट कर रोने लगी मंजर बेहद भावुक हो चला ...!
क्या कर्म किया है विधाता क्यों सजा दिया ये बता जा , तू मूरत बन मुस्काता मेरे दुख में कोई खड़ा ना
तू मुझको इतना बता जा मुझे जन्म दिया क्यों तूने जब मेरी नही सुनवाई मैं अबला क्यों बेचारी
तेरी ये अदालत दुनिया हर फैसले हम पर थोंपे , नारी को अबला कहकर उसका क्यो शोषण होता
तूँ सर्वशक्ति सर्वेश्वर क्यो ऐसा दिन दिखलाया अपने ही जिस्म पर हक ना हमें क्यों बन्दी घुट घुट जीते
तू दूर खड़ा मुस्काये थोड़ी तो दया दिखला जा अन्याय के आगे कब तक नारी ही घुटने टेके
बदलो सृष्टि का विधान हे विष्णु श्री भगवान कल्कि अवतार धरो प्रभु तुम और तार दो नारी जात
अब सहन ना होती पीड़ा जलमग्न हो सृष्टि सारी यह पुरुष प्रधान की बेड़ी ना हो फिर बेड़ा गड़क ना होता !!
घर के बाहर भीड़ खड़ी हो गई आस-पास की महिलाएं एकत्रित हुई और भजन गाने वाले की एक झलक देखने को उतावली हो रही थी ।
एक महिला ने दूसरी महिला से कहा..." बहन देखो जो हम कहने की हिम्मत ना जुटा सके हमारे उस दर्द और घुटन को किसी ने भजन में पिरो दिया कितना सुंदर गायन है कौन है ये सुरीली ???
सभी लोग देखना चाहते थे भजन गायिका को परन्तु रामानन्द खुद में ही कुलबुलाये हुए थे भजन सुनकर उनके अहम पर जैसे आरी चल गई हो । तिलमिलाए से इधर-उधर घूमने लगे। बालकनी में जाकर देखा तो घर के बाहर भीड़ देखकर चकरा गए।
और सोचने लगे कि ये इतनी सारी महिलाएं एक साथ लगता है ये सोच रही हैं कि मेरी बेटी या पत्नी ने यह हिमाकत की है अभी सच बता देता हूँ और बालकनी से चिल्लाए ..."ओ पत्नी देवी अपनी बेटी को लेकर जरा बालकनी में आइए??
दोनों भागती हुई बालकनी में पहुंची तो क्या देखती है इतनी सारी भीड़ और सभी गाने वाले कि तारीफ कर रहे हैं माँ बेटी चुप रहीं अब घर के मुखिया होने के नाते रामानन्द ने जवाब दिया आप लोग जाइये यहां से देख लिया मेरी बेटी और पत्नी चुप हैं इन्होंने इतना बकवास और बेसुरा नहीं गाया अब आप लोग जा सकती हैं । आगे कुछ और कह पाते कि एक जोगन लाल साड़ी पहने हाथ मे ढोलक लिए सिर पर दुपट्टा पैरों में खड़ाऊं मस्तक पर चंदन और गर्दन में रुद्राक्ष पहने हुए महिलाओं को रोकती है और कहती है बहनों यह भजन मैने गाया है आओ मेरे साथ और अपने हक के लिए आवाज उठाओ । तुम एकजुट हो जाओगी तो कोई तुम्हे नहीं दबा सकता ।
उसका प्रवचन लगातार जारी रहा बाकी पुरुष उसे पागल करार कर उसकी खिल्ली उड़ा रहे थे और अपनी महिलाओं को समझाबुझाकर घर लेने आ गए पर सभी के तेवर में अंगारे बरस रहे थे।
कुछ एक औरते पुरुषों की चिकनी चुपड़ी बातों और धमकी मि आकर चली गई पर बहुत सी तादात ज्यो की त्यों खड़ी रहीं और आगे की योजना और रणनीति पर साध्वी के मर्दशन में चल पड़ीं ।
साध्वी उन महिलाओं को एक ऐसे टापू पर ले गई जहां सिर्फ महिलाएं ही रहती है और मातृसत्ता का बोलबाला और हरिकथा का नित्य श्रवण जैसा भक्तिमय माहौल था। और जीविका के नाम पर नित्य के कार्य जो सिर्फ महिलाएं करती थी वहां किसी भी पुरुष का पहुंच पाना नामुमकिन था।
टापू के चारो ओर महिला सुरक्षा बल जो शस्त्र, अस्त्र, शास्त्र,नीति,न्याय,ज्ञान,धर्म,कर्म , कूटनीति, राजनीति में दक्ष थी उनका पहरा था। इसलिए वह टापू सुरक्षित था
ऐसी कोई भी महिला नही थी जिसे कुशलता प्राप्त ना हो बल्कि आत्मरक्षा और टापू की रक्षा उनकी ही जिम्मेदारी थी इसलिए सभी प्रशिक्षित की जाती थीं ।
रामानन्द के गांव में खलबली मच गई टापू पर आक्रमण किया गया और इस बार पुरुष दल की करारी हार हुई जो आस पास के नगर में जंगल की आग की तरह फैल गया।
और पुरुषों की मर्दानगी पर महिलाएं हंसने लगी उन्हें भी हौंसला मिला कि वे भी अब आवाज उठाएं ।
समाज का बिगड़ता ढांचा देख पंचायते जो पुरुष प्रधान की नींव थी वह भी बौखला गईं सरपंच और पंचों की डूब मरने वाली हालत हो गई।
कि वे शर्म से किसे सम्बोधित करें और क्या कहें ???
क्योंकि जिनपर हुक्म किया जाता था वे तो औरते होती थी अब किस पर हुकूमत और कैसी मर्दानगी??
क्रमश....
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