अरिष्टासुर का वध
हे जगदीश्वर हे भुवनेश्वर भक्तों के रक्षक हे कृष्ण मुरारी,
ब्रज मंडल पर संकट छाया कृपा कर टारो विपदा भारी।।
सुंदर चरितम , निश्चल भगवन, देवों के देव तुम्ही लीलाधारी,
यदा कदा जब भीड़ पड़े हरते शोक , दुष्ट, महाप्रलयकारी।।
योगमाया जग तुम्हहिं रचाते रहें लवलीन योगी समाधिष्ट,
खेल खेल में वृषभ भयंकर आयो हरो जगदीश अरिष्ट ।।
ब्रज के गोप गोपियां सारी गईया कृष्ण कृष्ण पुकारें,
मित्रों सखियों गईयों को देख के दौड़े आए कन्हईया प्यारे।।
अरिष्टकारी असुर अत्याचारी अरिष्टासुर का प्रकोप है भारी,
ब्रज में अत्यंत कोप भयंकर, त्रस्त है व्रजवासी हे अंतर्यामी।।
ग्वालों के खेल का नाश किया वो करो नाश वृषभ का हे त्रिपुरारी,
कृष्ण कहें धरो धैर्य सखा शोक करना नहीं सुनो मेरी वाणी ।।
मुस्काए मगन हुए श्री माधव, गोपियां गोपों के प्राण प्यारे,
गोपाें को तटस्थ करके मुरारी भिड़े दुष्ट से जैसे काल पधारे।।
पूंछ पकड़ अरिष्टासुर प्रभु पवन वेग से धूल चखाए,
दो कोंस योजन जाके गिरा , प्रभु दुष्ट को नाच नचाय संघारे ।।
ज्यों ही शिला श्रीकृष्ण पर फेंके पलट बार से अरिष्ट उद्धारे,
धन्य है लीला कृष्ण तुम्हारी वृषभ तन तजे मुक्ति धाम पधारे।।
"श्रीकृष्णकथा महाकव्य -३७",
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