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श्रीकृष्ण महाकाव्य अक्रूर द्वारा कृष्ण के दिव्य विराट रूप की स्तुति



हे चतुर्भूजा धारी नारायण लक्ष्मीप्रिये वत्सल भगवन।
तुम्हरी जय हो माधव कृष्णम राधापति मुरलीधर भगवन।।

सुर लोक के नायक काल विनाशक ब्रम्हा विष्णु शिव एकेश्वर ।
करो कृपा दृष्टि प्रभु नटनागर  अक्रूर  विनय सुनो सर्वेश्वर ।।

हे कमलनयन अदभुत लोचन पितांबरधारी  ब्रजभूषण ।
विनसे मद लोभ कटे जम फंद  भजूं गोविंद श्री नारायण।

अक्रूर विराट स्वरूप लखे  कर जोरि विनय करे अभिनंदन।
तुम्हरे  यश गावत वेद  है हारत ऋषि मुनि देव करें वंदन ।।

मायापति कृष्णम नमामि भगवन मानस प्रेम हो गोविंदम।
व्रजवासी आनंदित गोकुल हर्षित घटवासी करो सुमंगलम ।।

चंद्रादि सूर्य नेत्र तिहारे ,दिवस रात्रि अपलक पलक ।
मुखड़ा है अग्नि ,नाभि अंबर , विराट रूप निर्लिप्त कमल ।।

कानन दिशाएं, स्वर्ग शीष , भुजा देवगण , कुक्षि: जलधाम ।
वायु है जैसे प्राणशक्ति प्रभु , वृक्ष  औषधि  सर्व  रोम।।

राधा के मोहन नंद दुलारे , यशोमति  प्रिय   देवकीनंदन।
मेघा है केश ,नख अस्थि गिरि ,जस जीव आश्रय जलाशय।।

कच्छक , मत्स्य, वाराहरूप , हयग्रीव, नरसिंह  धारते ।
अवतार युग युग  सर्व शोक  भव भय  विकारहि नाश्य्ते ।।

सब पंथ गायें स्तुतियां सुर गण उपासक  वैष्णवजन ।
प्रभु तुम्हे रिझाएं भांति भांति भक्ति भाव भर मुनिजन ।।

रमते हो योगी हृदय में ,जस कीट गुल्लर फल पड़े ।
करो कृपा भक्तवत्सल नारायण  अक्रूर मोह माया टरे ।।


"श्रीकृष्णकथा महाकव्य -४१", :,https://pratilipi.page.link/vvbsTnfhJC3uMQPv7

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