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रक्षाबंधन पर पितृसत्ता का बंधन

राखी मिठाई कपड़े लत्ते त्योहारों पर  काज,
  देखो घर आई है बहना लूट ले जायेगी आज।।

बेशक लूटें बहन की संपत्ति और भरी हो तिजोरी,
जोर जोर से भाई चिल्लाएं आएंगी बहनें लुटेरी।।

दौलत भाई विरासत पाएं बहनें किस्मत की मारी रहीं,
बहने घर आए तो सहमें जेबें अपनी खाली रही ।।

भाभी बोली दीदी आई  किससे लेंगे उधार जी,
बस थोड़े  ही देर में दूजी बहना घर पर पधारे जी।।

भईया बोले सुनो हे प्रिये , खर्चा लूंगा बचाय,
बस तुम मेरा कमाल देखना बीवी गई लजाय।।

बोली प्रियवर कितने शातिर चला है तुमने चाल,
बहनों के आगे दुखड़ा कह खर्चा लिया बचाय ।।

बहनों का संसार न अपना खाली हाथ ससुराल आईं,
पिता के संपत्ति त्याग के बहनें हिस्सेदारी भूल गईं ।।

कानाफूसी करते हुए भाभी की बात को सुन बहना ,
अपमानों के विष को पीकर इज्जत से कहती भईया ।।

मान गई दोनो बहने क्या खाक करेंगे रक्षा भाई,
मां बाबूजी याद आते हैं आंसू छलकाई बहना ।।

मन में पीड़ा हंसता चेहरा भाई को राखी बांध दिया,
अपमानो के वार को सहकर फर्ज बहन ने निभा दिया।।

रक्षाबंधन का त्योहार तुम्हे मुबारक हो खुशियां
भाई भाभी साथ निभाना मेरा क्या अपना भईया।।

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