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राष्ट्र की एकता में धर्म की परिभाषा !

 देश सदियों से प्रथाओं, आडंबरों ,जातिवाद, छुआछूत में फंसा है  जबकि वर्ण व्यवस्था जैसी कोई चीज होनी ही नहीं चाहिए थी  वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो हर इंसान एक ही प्रक्रिया से होकर जन्म लेता है और माता के गर्भ में मल मूत्र से लिपटा हुआ बाहर आकर  खुद को वेदों के ज्ञाता कहकर समाज की कमान अपने हाथों में rkh  लेटे हैं और शास्त्रों का हवाला देकर समाज के मानसिकता को कमजोर बनाया जाता है इसलिए लोग धर्म से विमुख हो रहे हैं , नास्तिक हो रहे हैं किंतु धर्म जो मानवता को एक धागे में पिरोता है वह धर्म कभी दूषित नहीं था  बस एक वर्ग विशेष ने खुद को धर्म का ठेकेदार  बना दिया और आज भी  हमारी रगो में जातिवाद, खून खराबा, वैमनस्यता, आरक्षण विरोध, या आरक्षण के पक्षधर मिलकर लड़ रहे हैं ऊपर से कहा जाता है कि देश एकजुट रहे तो कोई भी  पड़ोसी मुल्क हमला नहीं कर सकता। 

मुझे लगता है धर्म की नई परिभाषा होनी चाहिए ।

 

✓कोई आपका हक छीने तो आवाज उठाओ

✓महिलाओं को मानसिक गुलाम बनाए तो यह सोचकर चुप ना रहो कि नर्क मिलेगा कृष्ण ने मामा, और बुआ के बेटे का वध करके अन्याय के लिए लड़ना सिखाया अभिप्राय आप कानून का सहारा लो, उन रिश्तों को त्याग दो जो विषैले हैं , समाज के  डर से चुप मत रहो ।

 ✓जातिवाद पर प्रहार मत होने दो कानून की मदद से मानहानि का दावा पेश करो

✓उनको नंगा करो जो बड़े और सम्मानित बनकर आपकी विवशता, शराफत का फायदा उठाते हैं नंगा यानी  सबूत जुटाओ, सरेआम चर्चा करो, स्टिंग ऑपरेशन करो जो हो सके कानूनी दायरे में वह काम करो ।

✓अपने ऊपर किसी बाहरी फैसले को अधिनायक मत बनने दो रिश्तेदार, पड़ोसी, मित्र इनको उतना ही मान दो जितना जरूरी है । 


✓भगवान के लिए नास्तिक मत बनो बस  धर्म की परिभाषा बदल डालो , इंसानियत की सेवा ही भगवान की सेवा से प्रेरित रहो, मदर टेरेसा, गांधी  जैसे सुधारकों से सीखो । 

✓ईश्वर में आस्था रखो यह सोचकर की जैसे तुम अपने सांसों को देख नहीं सकते , महसूस करते हो  , जहर को खा नहीं  सकते पर  सुनकर, पढ़कर मान जाते हो कि जहर , जहर  है ।


वैसे ही इंसानियत में ईश्वर को साक्षात देखो , मानो और समानता के भाव से  समाज को योगदान दो ।

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