जिस प्रकार एक कछुआ खतरा सामने आने पर अपनेअंगो को अपनी ढाल में समेट लेता है उसी प्रकार एक आत्मज्ञानी भक्त को संसार के माया रूपी खतरों से बचने के लियेप्रभु के नाम रूपी ढाल में अपनी बाहरी वृतियीं को समेट लेना चाहिए ।।
भक्ति में बाधक है हमारा आलस्य , अत्यधिक् भोजन करना हमारे जीवन को विलासी बनाता है एक योगी को चाहिए कि वह अपनी समस्त ऊर्जा को अपने भीतर समेत ले और सांसारिक पदार्थों को सीमित रूप में धारण करे ।।
मन की तीव्र गति भटकाव का कारण है सच्चे सद्गुरु के शरण मे आकर ही हमें भटकाव से बचने का मार्ग मिलता है और दुर्लभ आत्मज्ञान की सिद्धि से प्राणी भव सागर तर जाता है । ।
भक्ति में बाधक है हमारा आलस्य , अत्यधिक् भोजन करना हमारे जीवन को विलासी बनाता है एक योगी को चाहिए कि वह अपनी समस्त ऊर्जा को अपने भीतर समेत ले और सांसारिक पदार्थों को सीमित रूप में धारण करे ।।
मन की तीव्र गति भटकाव का कारण है सच्चे सद्गुरु के शरण मे आकर ही हमें भटकाव से बचने का मार्ग मिलता है और दुर्लभ आत्मज्ञान की सिद्धि से प्राणी भव सागर तर जाता है । ।
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