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मुक्तक

सदवृतियों का अंत

पद प्रतिष्ठा मान बड़ाई का हो भाव प्रधान जहाँ
चुगलीबाजी और धृष्टता से मानव हो भ्रष्ट सदा
ज्ञान गर्व से महा विदूषक सर्वश्रेष्ठता अहम् पले
विनय नम्रता दया करुण सदवृतियों का हो अंत वहां।।

★संयुक्त परिवार पर

भरा पूरा अगर परिवार हो खुशियाँ चौगुनी हो

खुशी और गम में हों सब साथ धरती भी स्वर्ग सा हो 

कौन कहता है एकल ही वही परिवार खुश रहते

आपसी प्रेम हो दिल में संयुक्त परिवार खुश रहते ।।



★निस्वार्थ भावना पर

किसी पर जान छिड़कूँ तो कभी उम्मीद ना रखती ,

 निभाती हूँ जिन रिश्तों को सदा सहयोग करती हूँ  

सामाजिक दोहरे प्रपंचों ,से खुद तटस्थ रहती हूँ

मगर वंचित सामाजिक कार्य को सौभाग्य कहती हूँ ।।


★छल प्रपंच पर

सरल दिखती हूँ पर मुझको समझना है नहीं आसां 

घटाएं नभ में छाती हैं मगर बरसात होती क्या

जो जैसा है उसे उसकी ही भाषा में समझती हूँ 

चाल कोई चले हर बात का उत्तर मैं होती हूँ ।।


★परमार्थ पर

सरल हूँ सहज हूँ अव्यक्त भावों का समन्दर हूँ 

, सामाजिक रोष से कुपित सृजित उद्गार करती हूँ ,

 विरोधी हूँ  कट्टरता की ,  सामाजिक दूरी रखती हूँ ,

 मगर सेवी भावों से दिल का दरिया तर  ही रखती हूँ ।।


★स्वार्थ से परे मानवता

खुद के खातिर जीते हो तो,मानव -पशु में अंतर क्या , 

कोल्हू के बैल से खटकर पेट पूजन से होता क्या ,

 मिला है तन तुम्हे जीवन श्रेष्ठ परहित में जीने को ,

कि वृक्ष फल खुद ना खाकर कर देता है समर्पित मानव को ।।


"★वफादारी की सीख

गुल जो खुशबू फिजाओं में छिड़कर मुस्कुराता है 

वृक्ष फल लदा मानव की क्षुधा तृप्ति को चोटिल होता है

पशु बेहतर सीख देते हैं हमें वफादारी दिखाकर के , 

तो क्यों मानव पग खींच लेता है सत-पथ पर चलने से ।।


★नारी ,नारी की दुश्मन क्यों ?

नारी तन मन से  कोमल  , सुकुमारी , सुसभ्य 

किन्तु तिरियाचरित रच मंथरा उपमा पाये

कहते हैं हम पुरुष को करते हैं अत्याचार

किन्तु कुबुद्धि नारी , नारी की हर लेती प्राण । 

★छुआछूत का रूप कोरोना

विभत्स था प्रचंड था कोरोना महाकाल था , कोरोना योद्धाओं के साथ छुआछूत अनन्त था

शुरू हुआ भारत मे जहां भेदभाव बेअंत था हमारे देश मे कहीं मानवता का अंत था

कहीं दिखा मानवता कहीं दिखा क्रूरता , डॉक्टर्स नर्स स्टाफ हॉस्पिटल भी त्रस्त थे

जुल्म सहते गए योद्धा हमारे  देश के ,मगर नही  इलाज से कोई भी महरूम था।

बहुत  दिखा हमें कोरोना काल की विभत्सना , प्रकोप कम हुआ मगर ना भेदभाव कम हुआ ।


अल्फाज सिमट जाते हैं जब ,दिल शोर मचलने लगता है

ख्वाबो में कोई अफसाना हमको ,महज हकीकत लगता है

जो है केवल भ्रमित स्वप्न सा  ,सन्सार मरीचिका लगता है 

कहने को तो संग सभी पर,  'हंस' /soul अकेला जाता है ।

◆सर्प नेवला मित्र मित्र हों, मानव आपस ना द्वन्दी हो 

सत्ता ,पावर, कूटचाल से , कोई प्राणी ना आहत हो
संकल्पित आदर्श देश पर कुछ तो कार्य सहज निश्छल हो
राष्ट्र प्रेम अन्तस में भरकर  परहितार्थ में  कार्य उचित हो।।

★  शौर्य गूंजेगा अम्बर तक , तिरंगा मुस्कुरायेगा
सैन्य क्षमता,अदम्यता देख आतंकी चकराएँगे
जल,थल,नभ तलक व्यापक है किस्से हिन्द वीरों के
चौकसी देख भारत की दुश्मन थरथरायेगा ।।

★बोल मीठे हो होठो पर मगर दिल में छलावा  हो
कभी उस शख्स को खुद से भी ज्यादा मान मत देना
तुम्हारी मासूमियत को कोई एक बार छल जाए
स्वार्थ पूर्ति पुलिंदों को बढ़ावा फिर नहीं देना।।

जज़्बा तिरंगे सा ऊंचा है सेना के वीर जवानों का
जान गंवाने की ना फ़िकर है हिम्मत ,जांबाजी इनका
देश को तोड़ने वालों सुन लो नफरत ना पलने देंगे ।
काट दिए जाएंगे धड़ से शीश जो भारत खण्ड करें।।

★अंतिम सफर में साथ पूरा कौम चल पड़ा
साहस को वीरों के नमन , सलाम कर चले
आंखों में आंसू भरकर सेवी भाव याद कर
शहीदों की चिंताओं को सम्मान दे रहे ।।

"★कोई गर ना समझे तो  समझाना बेकार है ।
चाहत के समुंदर में यूं उतरना बेकार है ।
ठोकरें खाकर भी इश्क में जो ना सम्भले ।
देवदासों के जज्ब ए इश्क को मेरा सलाम है ।।


★ प्रेम में फासले की अहमियत वो शख्स क्या जाने
जो खुद के ही लिए जीने की कसमें वादे हैं करते
प्रेम की अमर गाथा सुन लो तुम एक बार वीरों से
जो अपने प्रेम और घर बार छोड़े देश रक्षा में ।।

●लोकतंत्र की हत्या करके ,कितना खैर मना लोगे
संविधान को  तार तार कर , जन विद्रोह दबा दोगे
अगर समझते हो पावर ,सत्ता में तुम बलशाली हो
निकलो जल्द भरम से अपने , शेर नहीं तुम गीदड़ हो ।।

★मफ़लर ,टोपी, पैंट, शर्ट ,हुलिया पर मत जाना तुम ।
लंका को एक लघु रूप धर, वानर कम ना आंको तुम।
सहज स्वभाव,धीर,कर्मठता,भ्रष्टाचार का काल हूँ मैं
जिद्दी जितना ,ढीठ हूँ उतना , कहता हूँ सो करता हूँ।

★जज्बा देखो देश भक्तों की, आंधी ,तूफानों से निडर हैं ।
शून्य डिग्री ताप हिमालय, जान गंवाने की ना फ़िकर है।
हिम्मत देश की टूट ना जाये, जज़्बा हममें जगाते हैं ।
करके हिफाज़त सीमाओं की ,सीने पर गोली खाते हैं।।




असह्य वेदना 
असह्य वेदना शूल बन, पीर दिल को छल रही है
जख्म गहरे हैं हरे ,दिल आपबीती कह रहा है
नदिया के दो छोर सा ,जीवन घोर दुविधा भरा है
हूँक सी गुंजन ह्रदयतल,पीर सागर में घिरी है
अंत वेदना का नहीं , सिसकियों में गूँज  रही
अनकहे लफ्जों की खामोशी ह्रदय  क्रंदन बनी।।

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