कागज के टुकड़ों को ग्लू से, जोड़कर देखा होगा तुमने
वैसे ही यह जीवन भी, प्रणय विरह से जुड़ा हुआ है
हर एहसास इस मन पर, क्यों करता है आघात
हर्ष,शोक,और व्याकुलता इस चंचल मन का साम्राज्य
वैसे ही यह जीवन भी, प्रणय विरह से जुड़ा हुआ है
हर एहसास इस मन पर, क्यों करता है आघात
हर्ष,शोक,और व्याकुलता इस चंचल मन का साम्राज्य
दृढ़ होती अब अंतर्मन में , इच्छाएँ बनकर नयी तरंगें
जैसे ग्लू से चिपका कागज टुकड़ो में बंट जाता है
ऐसे ही यह मन शरीर से, दृढ़ता से जकड़े जाता है
तब अंतकाल पीड़ा का कारण, यह चंचल मन होता है
मन को प्रभाव से मुक्त करे जो, हंसते हुए निर्वाण पा जाता है।
जैसे ग्लू से चिपका कागज टुकड़ो में बंट जाता है
ऐसे ही यह मन शरीर से, दृढ़ता से जकड़े जाता है
तब अंतकाल पीड़ा का कारण, यह चंचल मन होता है
मन को प्रभाव से मुक्त करे जो, हंसते हुए निर्वाण पा जाता है।
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