गुरु पूजा क्यों है ख़ास-----
गुरु र्च ब्रम्हा गुरु र्च विष्णु गुरु देवो महेश्वरा..........
गुरु और शिष्य परंपरा अमर सनातन धर्म का सिद्धांत है पुरातन समय में महर्षि वेदव्यास जी द्वारा धर्म-शास्त्रों की व्याख्या की गई थी और गुरु शिष्य परंपरा की नींव पड़ी ।
गुरु पूर्णिमा का अर्थ है जब चांद अपने पूर्ण रूप में होता है और वेदवास जी का जन्म भी इसी पूर्णिमा में हुआ था जिस कारण उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा मनाया जाने लगा ।
समय के साथ- साथ गुरु शिष्य परंपरा में अनेकों बदलाव हुए । मुस्लिम धर्म में पैगम्बर, सूफी,औलिया, हिन्दू धर्म में मठाधीश, मंडलेश्वर,महामंडलेश्वर की उपासना, सिक्ख धर्म में 10 सच्चे बादशाहों की पूजा , यहूदी धर्म में जीसस की उपासना का ट्रेंड अस्तित्व में आया ।
गुरु पूजा का महत्त्व-- बालक जब धरती पर जन्म लेके आता है उसके भावी भविष्य की नींव गढ़ने के लिए पुरातन गुरुकुलों ,आधुनिक स्कूलों , मदरसों में भेजने का प्रावधान था । जीवन के मूलभूत आजीविका हेतु ज्ञान और कर्म को महत्व दिया गया है । शिक्षक दिवस जो कि सर्वपल्ली राधाकृष्ण के सम्मान में मनाया जाता है औए हम अपने शिक्षकों का सम्मान करते हुए इस दिन को उनके लिए यादगार बना देते हैं ठीक उसी प्रकार आध्यात्मिक ज्ञान के दाता सदगुरू ,आत्मज्ञानी गुरु की पूजा की नींव महर्षि वेदव्यास से पड़ी ।
गुरु पूजा का महत्व इसी से पता चलता है ठीक वैसे ही प्रकार नल रूपी ज्ञान से ज्ञान की धारा ऊपर से नीचे की ओर प्रवाहित होती है और शिष्य रूपी बाल्टी ज्ञान रूपी नीर से लबालब भर जाता है और शिष्य अपने गुरु का धन्यवाद प्रकट करता है ।
शिष्य की भावना और पवित्रता क्यों है जरूरी----जिस प्रकार एक छेद हुए लोटे को पानी से भरे टब में रखते हैं और वह डूब जाता है क्योंकि उसके तल से पानी रिसता हुआ लोटे में भर जाता है उसी प्रकार शिष्य के हृदय रूपी घड़े में विकारों का समावेश हो तो ज्ञान को ग्रहण करने में वह असमर्थ हो जाएगा और संसार रूपी टब में डूब जायेगा ।
इसलिए जीवन में ज्ञान का महत्त्व है ,गुरु का महत्त्व है , सच्चे मार्गदर्शक का होना आवश्यक है । केवल इस लोक के लिए नहीं बल्कि अलौकिक जगत से तारतम्य स्थापित करने के लिए शिष्य को आत्मज्ञान की दीक्षा लेने की आवश्यकता होती है ।
संसार रूपी वैतरणी से पार लगाते हैं तत्वदर्शी गुरु------हमने संसार के भौतिक डिग्रियों को प्राप्त कर लिया आजीविका चलाने के लिए तो ठीक है , उत्तम है और आवश्यक भी । किन्तु भौतिक के साथ मानव कि आध्यात्मिक क्षुधा भी होती है जिसकी तृप्ति अनिवार्य हो जाती है और तब हमें आभास होता है कि संसार के वैतरणी को पार करने की कला का ज्ञान होना भी आवश्यक है ।
बिनु सत्संग विवेक ना होई ,राम कृपा बिनु सुलभ ना सोई- मानस प्रसंग
हरि को तजूं पर गुरू ना बिसारूं , गुरु के सम हरि को ना निहारूँ ,हरि ने पांच चोर दियो साथ , गुरु ने दी छुड़ाय -शब्द सहजो बाई
गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागूं पांव बलिहारी गुरु आपने जिन गोविंद दियो लखय--कबीर वाणी
मीरा ने संत रैदास जी को गुरु बनाया , भक्त प्रह्लाद ने नारद जी को, कबीर ने संत रामानन्द को अर्थात अध्यात्म के दृष्टि से देखें तो जो हृदय में परमात्मा का साक्षात्कार करा दे वही तत्ववेत्ता गुरु है , उसी का स्थान परमेश्वर से बड़ा बताया जैसे सहजो बाई और कबीर के शब्दों में हमने जाना । बाकी संसार के विद्याओं को आजीविका हेतु प्रदत किये जाने वाले गुरु भी सम्मानीय हैं हर वह मार्गदर्शक सम्मान का पात्र है जो जीवन को दिशा प्रदान करता है किंतु कबीर ने ब्रम्हज्ञान के दाता गुरु को दुनिया मे सर्वश्रेष्ठ स्थान प्रदान किया है । जो गुरु संसार सागर से शिष्य को चौरासी के बन्धन से मुक्त कर देते हैं और शिष्य का आवागमन चक्र से नाता छूट जाता है । ऐसे गुरु के लिए अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु गुरु पूजा का अवसर हमे याद दिलाता है ।
सब धरती कागज करू , लेखनी सब बन जयें , सैट समुंदर की मासी करू , गुरु गन लिखा ना जय।।।
गुरु र्च ब्रम्हा गुरु र्च विष्णु गुरु देवो महेश्वरा..........
गुरु और शिष्य परंपरा अमर सनातन धर्म का सिद्धांत है पुरातन समय में महर्षि वेदव्यास जी द्वारा धर्म-शास्त्रों की व्याख्या की गई थी और गुरु शिष्य परंपरा की नींव पड़ी ।
गुरु पूर्णिमा का अर्थ है जब चांद अपने पूर्ण रूप में होता है और वेदवास जी का जन्म भी इसी पूर्णिमा में हुआ था जिस कारण उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा मनाया जाने लगा ।
समय के साथ- साथ गुरु शिष्य परंपरा में अनेकों बदलाव हुए । मुस्लिम धर्म में पैगम्बर, सूफी,औलिया, हिन्दू धर्म में मठाधीश, मंडलेश्वर,महामंडलेश्वर की उपासना, सिक्ख धर्म में 10 सच्चे बादशाहों की पूजा , यहूदी धर्म में जीसस की उपासना का ट्रेंड अस्तित्व में आया ।
गुरु पूजा का महत्त्व-- बालक जब धरती पर जन्म लेके आता है उसके भावी भविष्य की नींव गढ़ने के लिए पुरातन गुरुकुलों ,आधुनिक स्कूलों , मदरसों में भेजने का प्रावधान था । जीवन के मूलभूत आजीविका हेतु ज्ञान और कर्म को महत्व दिया गया है । शिक्षक दिवस जो कि सर्वपल्ली राधाकृष्ण के सम्मान में मनाया जाता है औए हम अपने शिक्षकों का सम्मान करते हुए इस दिन को उनके लिए यादगार बना देते हैं ठीक उसी प्रकार आध्यात्मिक ज्ञान के दाता सदगुरू ,आत्मज्ञानी गुरु की पूजा की नींव महर्षि वेदव्यास से पड़ी ।
गुरु पूजा का महत्व इसी से पता चलता है ठीक वैसे ही प्रकार नल रूपी ज्ञान से ज्ञान की धारा ऊपर से नीचे की ओर प्रवाहित होती है और शिष्य रूपी बाल्टी ज्ञान रूपी नीर से लबालब भर जाता है और शिष्य अपने गुरु का धन्यवाद प्रकट करता है ।
शिष्य की भावना और पवित्रता क्यों है जरूरी----जिस प्रकार एक छेद हुए लोटे को पानी से भरे टब में रखते हैं और वह डूब जाता है क्योंकि उसके तल से पानी रिसता हुआ लोटे में भर जाता है उसी प्रकार शिष्य के हृदय रूपी घड़े में विकारों का समावेश हो तो ज्ञान को ग्रहण करने में वह असमर्थ हो जाएगा और संसार रूपी टब में डूब जायेगा ।
इसलिए जीवन में ज्ञान का महत्त्व है ,गुरु का महत्त्व है , सच्चे मार्गदर्शक का होना आवश्यक है । केवल इस लोक के लिए नहीं बल्कि अलौकिक जगत से तारतम्य स्थापित करने के लिए शिष्य को आत्मज्ञान की दीक्षा लेने की आवश्यकता होती है ।
संसार रूपी वैतरणी से पार लगाते हैं तत्वदर्शी गुरु------हमने संसार के भौतिक डिग्रियों को प्राप्त कर लिया आजीविका चलाने के लिए तो ठीक है , उत्तम है और आवश्यक भी । किन्तु भौतिक के साथ मानव कि आध्यात्मिक क्षुधा भी होती है जिसकी तृप्ति अनिवार्य हो जाती है और तब हमें आभास होता है कि संसार के वैतरणी को पार करने की कला का ज्ञान होना भी आवश्यक है ।
बिनु सत्संग विवेक ना होई ,राम कृपा बिनु सुलभ ना सोई- मानस प्रसंग
हरि को तजूं पर गुरू ना बिसारूं , गुरु के सम हरि को ना निहारूँ ,हरि ने पांच चोर दियो साथ , गुरु ने दी छुड़ाय -शब्द सहजो बाई
गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागूं पांव बलिहारी गुरु आपने जिन गोविंद दियो लखय--कबीर वाणी
मीरा ने संत रैदास जी को गुरु बनाया , भक्त प्रह्लाद ने नारद जी को, कबीर ने संत रामानन्द को अर्थात अध्यात्म के दृष्टि से देखें तो जो हृदय में परमात्मा का साक्षात्कार करा दे वही तत्ववेत्ता गुरु है , उसी का स्थान परमेश्वर से बड़ा बताया जैसे सहजो बाई और कबीर के शब्दों में हमने जाना । बाकी संसार के विद्याओं को आजीविका हेतु प्रदत किये जाने वाले गुरु भी सम्मानीय हैं हर वह मार्गदर्शक सम्मान का पात्र है जो जीवन को दिशा प्रदान करता है किंतु कबीर ने ब्रम्हज्ञान के दाता गुरु को दुनिया मे सर्वश्रेष्ठ स्थान प्रदान किया है । जो गुरु संसार सागर से शिष्य को चौरासी के बन्धन से मुक्त कर देते हैं और शिष्य का आवागमन चक्र से नाता छूट जाता है । ऐसे गुरु के लिए अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु गुरु पूजा का अवसर हमे याद दिलाता है ।
सब धरती कागज करू , लेखनी सब बन जयें , सैट समुंदर की मासी करू , गुरु गन लिखा ना जय।।।
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