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विधाता पर प्रश्नचिन्ह

आखिर क्यों कुछ प्रश्न हैं ऐसे,
 जो हृदय में शूल बन चुभ रहे हैं
क्यों नमन करते हो तुम उस विधाता को ,
 जिसने जीवन का अनमोल उपहार भेंट किया

क्यों कोसते हो तुम उसे जब , 
दुखों की बिजली गिरती है
और हृदय पीड़ा की गर्जन से 
हाहाकार मचाते हो


क्यों आभार प्रकट करते हो तुम , 
जब कुदरत के गोद में स्वयं को आनंदित पाते हो

क्यों रुसवाई दिखती है  हर तरफ  , 
जब गरीब दरिद्रता के सागर में
मानव तिल तिल कर मर रहा होता है

क्यों दोष मढ़ते हो उस पर , 
जो अपनी हार को जीत में बदलने में अक्षम होते हो

क्यों फुले नहीं समाते जब 
मनचाही  इच्छा पूरी हो जाए
और हृदय के अनंत तलों से 
उसका आभार प्रकट करते हो

फिर। क्या यह सम्भव नहीं कि 
हम उस विधाता के प्रति
अपनी डांवाडोल प्रवृति छोड़ ,
 एकनिष्ठ भाव कायम कर सकें।।

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