एक बिंदु से प्रारम्भ हुई मैं , एक बिंदु पर खत्म हुई
वो प्रकाश पुंज था मुझमें मैने , अलौकिक दीदार किया
तन की शिथिल अवस्था थी , स्वप्नावस्था आभास हुआ
भारी उत्सव के क्रीड़ा में रंगमंच रोमांच भरा
रही तटस्थ रंगीन फ़िजा से , हलचल मन में नूतन था
दैवीय आदेश की अवहेलना , तनिक ना मन मे ईष्र्या था
आहत थी छण भर घटना से , मुझे आदेश निरन्तर था
अन्तस् ने अभिलाषाओं संग, तुमसे एक आदेश लिया
अट्हास भरे इस रंगमंच से , तेरे संग हो दूर चलूँ मैं ,
मेरी रुदन, अन्तस् की पीड़ा, तुमने जान उचित ठहराया
ज्यों ही अपने हृदय लगाया , भारी दुविधा दूर हुई
तनिक रही ना सुध बुध तन की , जीवित मुक्ति जान गई।।
गायत्री शर्मा
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