सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

स्वप्नावस्था के परे

 एक बिंदु से प्रारम्भ  हुई मैं , एक बिंदु पर खत्म हुई

वो प्रकाश पुंज था मुझमें मैने , अलौकिक दीदार किया

तन की शिथिल अवस्था थी , स्वप्नावस्था आभास हुआ

भारी उत्सव के क्रीड़ा में रंगमंच रोमांच भरा

रही तटस्थ रंगीन फ़िजा से , हलचल मन में नूतन था 

दैवीय आदेश की अवहेलना , तनिक ना मन मे ईष्र्या था

आहत थी छण भर घटना से , मुझे आदेश निरन्तर था 

अन्तस् ने अभिलाषाओं संग, तुमसे एक आदेश लिया

अट्हास भरे इस रंगमंच से , तेरे संग हो दूर चलूँ मैं , 

मेरी रुदन, अन्तस् की पीड़ा, तुमने जान उचित ठहराया

ज्यों ही अपने हृदय लगाया , भारी दुविधा दूर हुई 

तनिक रही ना सुध बुध तन की , जीवित मुक्ति जान गई।।

गायत्री शर्मा


टिप्पणियाँ