जब पार किया प्रतिछण सुख दुख ,के परे मुझे आभास हुआ कांटो से भरी पगडंडी ने , हर मोड़ सुखद एहसास भरा
हर सफ़र में तेरा साथ मिला , मुश्किल घड़ियाँ आसां हुई
जो बनकर आया हितैषी सदा, तेरी रहमत का पैगाम मिला,
अंतर्मन की अभिलाषाएँ , एक कल्पवृक्ष मुझमें है छुपा
पग पग अदृश्य अलौकिकता , घेरे है मुझे चहूँ ओर दिशा
नतमस्तक मैं करबद्ध विनय, करूँ व्यक्त हृदय उद्गार सभी
रुख मोड़ मेरा भव सागर से , मुक्ति का मार्ग दिखा दो प्रभु,
गायत्री शर्मा
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