जब मैं सिर झुकाती हूँ तेरे दर पर
मुझमें आत्मिक चेतना ज़ाग उठती है
जैसे कोई निर्जीव पौधा पुनः जीवित हो उठे
आभास ही कुछ ऐसा है कि
वाणी और स्वर दोनों मंत्रमुग्ध हैं
नतमस्तक हूँ मैं तेरी उदारता देख
दुर्भाग्य है उनका जो हंसते हैं
तुझसे प्रेम करने वालों पर ।।
गायत्री शर्मा
मुझमें आत्मिक चेतना ज़ाग उठती है
जैसे कोई निर्जीव पौधा पुनः जीवित हो उठे
आभास ही कुछ ऐसा है कि
वाणी और स्वर दोनों मंत्रमुग्ध हैं
नतमस्तक हूँ मैं तेरी उदारता देख
दुर्भाग्य है उनका जो हंसते हैं
तुझसे प्रेम करने वालों पर ।।
गायत्री शर्मा
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