स्वतंत्र है स्वतंत्र हैं हम पूर्ण गणतंत्र हैं
मां भारती की आन बान शान को सलाम है
दुश्मनों का सीना चीरें वीर मेरे देश के
चट्टानों से इरादों को नमन है नमन है
राष्ट्रवाद लोकमत एकस्वर आजादी
अन्य कुछ चाह नहीं आजादी ही चाहिए
भारतीय सेना दल बल अस्त्र शस्त्र सज्जित
पृष्ठ इतिहास के नवीन है नवीन है
अमर जवानों की शहाद्तों को याद करें
गणतंत्र महापर्व उत्सव जरूरी है
देश का कानून हो हर नागरिक स्वतंत्र हों
कुशासित हुकूमत ओ फिरंगियों धिक्कार है
कैसे भूल जाएं हम वीर राष्ट्र भक्तों को
इन्ही से इस देश में दिवाली ईद होली है
नमन है नमन है स्वराज्य महापर्व है
पुनः पुनः मां भारती के वीरों को नमन है।।
खुशियों से भरा हो लाखों पल ,कहीं नैन नमी से युक्त रहे झरझर बरखा जो बून्द पड़े , फिर भी अंगना हो अनल तले नभचर ख़ग दाना- दाना को ,अन्न नीर बिना जैसे तरसें विचरे नभः में पंखे लहरा , उन्मुक्त गगन से दूर चले जो क्षितीज दिखे पंखों के परे ,भानू किरणों से तपता रहा अंकित जो करूँ दुःख का बादल ,चहुँ ओर घिरे पर भीग रहे ना उड़ पाया न ठहर सका, हर तरफ ही नीड़ तलाश रहा बेबसी के काले बादलों ने ,सपनों की उड़ानें रद्द कर दी चंचल ऋतुओं का क्या कहने,बेवक्त मिजाज बदल बैठे बेमानी लगे सावन भी उसे ,वो मयूर नहीं जो थिरक सके पंखें भीगी नम नैन हुए, किस ओर दिशा में नीड़ बसे। गायत्री शर्मा
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें