रिश्तों की अनमोल कड़ी ,एक बार जुड़ जाये
तोड़े से टूटे नहीं , विफल प्रयास हो जाये
आज के रिश्ते कांच के , तुरंत ही आहत होय
आक्रोशी, लोभी स्वाभाव से , मानवता मिट जाये
प्रेम की बात हो सात बार , संभव कैसे होय
एक बार जो दिल टूटे , पुनः भरोसा खोय
सात हैं फेरे विवाह के , पति-पत्नी के बीच
निभा सके ना एक जनम ,सातवाँ कैसे होय
प्रेम भाव निष्कपट हो , तो भावना पूजित होय
भाव विकृति जब जब बढे , प्राणी दूषित होय
दौर 21वीं सदी का है , समय कहाँ है आज
टूटे दिल सिंगल रहें , सातवाँ कैसे होय।।
मौलिक रचना ©
गायत्री शर्मा गुंजन
(दिल्ली )
लेखक परिचय:
नाम - गायत्री शर्मा गुंजन
शिक्षा - बीएड, स्नातकोत्तर (राजनीति विज्ञान)
व्यवसाय - स्वतंत्र लेखन

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