जगमग जिसका अंतर्मन हो, बाहर भीतर स्थितप्रज्ञ हो
सुध हो जिसकी आत्मसंयमित ,मानव को कर दे जो भयहीन
धर्मसंहिता का ज्ञाता हो ,राम राज्य सा उसका दर हो
नीच अधम पतित मानव का ,करता जो उद्धार है
देव सदृश चैतन्य महाप्रभू ,सदगुरू तुम्हे प्रणाम है ।
गायत्री शर्मा
सुध हो जिसकी आत्मसंयमित ,मानव को कर दे जो भयहीन
धर्मसंहिता का ज्ञाता हो ,राम राज्य सा उसका दर हो
नीच अधम पतित मानव का ,करता जो उद्धार है
देव सदृश चैतन्य महाप्रभू ,सदगुरू तुम्हे प्रणाम है ।
गायत्री शर्मा
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