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तन्हा शाख़ -जीवन लीला

 

शाखों से टूटते पत्ते  अब कभी जुड़ नहीं पाएँगे

कितना दर्द  सहते है एक डाल पर जो खिलते हैं

जीवनभर सुख दुख सहते हैं मृगतृष्णा में जकड़े हैं

उम्र के ढलते मुरझा गए हैं बिन टूटे ही  सूख रहे हैं

शाख़ रह गया तन्हा तन्हा , भरी उदासी गुलशन में

 जीवन लीला खत्म हुई ,उम्मीद लिए नव जीवन का ।।


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