जन्मी है एक नन्ही परी रोशन हुआ ये घर आँगन
पिता की ऊँगली थामकर घूम रही है वो परी
नहीं है फ़िक्र भुत का और फिक्र नहीं भविष्य की
खुद में ही वो खिलखिलाती हर्षोल्लास पूर्ण है
खेलती है कांच के और काठ के खिलौनों से
झूम झूम नाचती है चुलबुली नन्ही परी
यौवन की दहलीज पर कदम उसने ज्यों रखा
समाज की नजरों में उतर गयी वो परी
एक वक्त था वात्सल्य पूर्ण प्रेम को पाती
आज इस यौवन को हैवानियत से बचाती
दंश टीस ह्रदय की तीव्रता से बढ़ रही
घूरती मवालियों के नजरों से वो बच रही
कितनी बड़ी हो गयी ,बचपन को पार कर
सोचकर विचार कर ब्याकुल हो रही है माँ
शुभ विवाह की जोरों शोरों से तैयारी चली
फूल सी आँगन में जहाँ चहकती थी वो परी
छोड़कर संसार अपना वो किसी की हो चली
मायके को भूलकर माँ का दिया वचन निभाती
बन गयी है आज वो किसी की जीवनसंगिनी
रिश्तों की डोर खुद संभालती है वो परी
जिस नाजों साज में पली वो दंश में तड़प रही
पुष्प की कोमलता से काँटों भरा सफ़र
प्रताड़ना को सहते हुए माँ की बातें सोच कर
बेटी उस घर को अपना स्वर्ग समझना
रूखी सूखी खाकर भी मुँह बंद रखना
ससुराल की गलतियों को छुपाये रखना
उनके सम्मान को बचाये रखना
सहते गई जुल्म सहमी हुई सी वो परी
मौत के द्वार पर खड़ी माँ को पुकारती
माँ तेरे संस्कारों ने मुझे यह सिला दिया
अत्याचार सहकर मैं खुद अपराधी बनी
माँ खामोश है अपनी गलती को स्वीकारती
बेटी को अब वो सीख दे रही है
नहीं सहना अब तक जो हमने सहा है
पति को परमेश्वर मान जिसकी पूजा की है
परमेश्वर भी नही बच सके कर्मों के फल से
दंड का विधान सभी के लिए जरुरी है
माँ के साहस ने नव जीवन प्रदान किया
उठकर मृत्यु शैया से वो सबला खड़ी हुई
उन अपराधियों को दंड दिला समाज को दर्शाया
फूलों की सुरक्षा में काँटों का होना जरूरी है।।
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