मेरा मन बार बार मुझसे प्रश्न करता है
मै उदास क्यों हूँ आत्मा ने कहा
तुम अहंकार वशीभूत हो गए हो
परंतु मन मानने को तैयार नहीं
देखती हूँ समाज में दुष्प्रवृतियों को
जो निरंतर मानव को पथभ्रष्ट कर रही हैं
आज अपनो ने अपने ही अस्तित्व को भूला दिया
लगता है इहलौकिक से अलौकिक जहाँ बेहतर होगा
हमारे ही तुच्छ विचारो ने अपनत्व को भुला दिया
अगर हम खुद को कभी ज्ञानवान ना समझें और
सदैव जिज्ञासु बनकर रहें तो सम्भव है
ये दुष्प्रवृतियां स्वत: ही नष्ट हो जाएँगी!
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