एक अरसा बीत चला कोई दर्द नासूर सा पनप रहा
ख्वाबों की चिताएं जलती रहीं ना धुंआ उठा ना राख हुआ
करवट बदली बेहद मैने आंखो मे उजाला नही दिखा
पर वक्त ने ज्यों करवट बदला ना भोर हुई ना रैन ढला
बिखरे अरमानों की लौ में दहकती सिसकी भर नम दो नैन हुए
आंसू पीकर राहत तो मिला होठो पर हंसी दिल जर्जर बना
कोई खबर रही ना तन-मन की चेतनता में तन शव सा रहा
जरा चैन- सुकूँ को पाकर भी दिल-दर्द कसक वैसा ही रहा
एक अरसा बीत चला कोई दर्द नासूर सा पनप रहा
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