श्वेत वस्त्र उजड़ा घर अंगना चूड़ी बिंदिया उजड़े हैं
छमछम थिरके पायल अंगना सूनापन झकझोरे है
जिसके प्रित में छोड़ के बाबुल का घर नहीं सुहाए
उस वीरांगना अर्धांगिनी के सारे साहस बिखरे है।।
ईश्वर से अरदास लगाये प्राण प्रिय की रक्षा हो
नंगे पांव चले मन्दिर को चाहें छाले पड़ते हों
ख़बरें मिली शहादत की तो गांव नगर भी कुँभलाये
बच्चे पूछें पापा ना आये मौन सभी निरुत्तर हों।।
आंसू हैं हुंकार है मानो गर्जन अन्तस् करता है
आशाओं का दीपक बुझकर तमस् हृदय में ढलता है
सखियों का श्रृंगार देख के फूट फूट कर रोती वो
यादों का एक मात्र सहारा उसका दामन भरता है ।।
लिखती है ये कलम व्यथा तो अश्क निरंतर बहते हैं
जाने कौन से देव धरा पर सैन्य रूप धर आते हैं
सोच के दशा वीरांगनाओं का थर थर कांप रहा है मन
दोनों जवानी कुर्बान देश पर गुँजन शीष झुकाती है।।
©®
गायत्री शर्मा गुँजन
दिल्ली
अंतर्राष्ट्रीय साहित्य परिषद क्रमांक
2273



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