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समानता किताबों में ही क्यों?

 

शालीनता का पाठ पढाया जाता है

अनुशासनहीनता पर लगाम लगता है

झूठे मर्यादाओं की बेङियो में जकङी

पितृसत्तात्मकता की चपेट में घिरी नारी

उसी शालीनता के साथ वह पूछती है

रूढीवादिता पर विनम्रता से प्रहार करती है

ङाल दो बेङियां उन बेटों के पैरों में

जकङ दो उनकी आजादी को घेरो में

ये आजादी तानाशाही ना बन जाए

लगाम लगा दो ऐसे परों को उङने में

समानता की बातें किताबो में ही क्यों रखें

हकीकत का अमलीजामा पहनकर तो देखें॥

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