आखिर क्यों कुछ प्रश्न हैं एैसे जो हृदय में शूल बन चुभ रहे
क्यों नमन करते हो तुम उस विधाता को जिसने
जीवन का एक अनमोल उपहार दिया
क्यों कोंसते हो तुम उसे जब दुखों की बिजली गिरती है
और हृदय पीङा की गर्जन से तब हाहाकार मचाते हो
क्यों आभार प्रगट करते हो जब कुदरत की गोद में लेटे
तुम स्वयं को आनंदित पाते हो
क्यों रूसवाई दिखती है जब गरीबी दरिद्रता के सागर में
मानव जीवन तिल -तिल मर रहा होता है
क्यों दोष देते हो उसे जब तुम अपनी हार को
जीत में बदलने में अक्षम होते हो
क्यों फूले नहीं समाते जब मनचाही इच्छा पूरी हो जाए और
हृदय के अनंत तलों से उसका आभार प्रगट करते हो
फिर क्या ये संभव नहीं कि हम उस विधाता के प्रति
अपनी ङांवाङोल प्रवृति छोङ एकनिष्ठ भाव कायम कर सकें !!!
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