इस चमन मे कोई दीया जलता है
हवा के रूख में बेचैन सा दौङता है
खामोशी से दहकता कुछ कहता है
अंधियारे को समेटता हुआ खुद में
वह खुद को ही अकेला पाकर
तुफानो से टकराने की जिद में है
ङर है कि तूफान उस पर हावी हो
उसके तेज को निस्तेज ना कर दे
यकीं है उसे वह नहीं मिट सकेगा
घोर अंधेरे में भी वह जलता रहेगा
सुना है जो अकेले ही चल पङता है
अपने मुकाम पर पहुंच ही जाता है
मुकाम कुछ हसरतें ख्वाहिशों से भरा
निर्धारित जीवन का लक्ष्य बनता है
खुद में ही जलकर रौशनी बिखेरता
उम्र की लघु सीमा खत्म होने को है
दीया फङफङाता सा बुझ जाएगा
शेष राख कचरे में समाहित होगा
दुख है उसके खाक में मिलने का
परंतु आशा की लौ नहीं बुझ सकेगा
इस समां में रौशनी बिखेरने वाला
कोई दीया पुन: जल उठेगा ॥
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